2016 छात्रा उत्पीड़न मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने शिक्षक की 5 साल की सजा बरकरार रखी, कहा- गुरु-शिष्य का रिश्ता ‘पवित्र’

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 में एक नाबालिग छात्रा के यौन उत्पीड़न के मामले में 65 वर्षीय पूर्व स्कूल शिक्षक की पांच साल की जेल की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य आरोपों में कोई बदलाव न होने की स्थिति में घटना की तारीख या क्रम से जुड़ी छोटी-मोटी विसंगतियों से पीड़िता की गवाही की विश्वसनीयता कम नहीं होती।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मधु जैन ने शिक्षक और छात्र के रिश्ते को ‘पवित्र’ करार दिया। 12 अगस्त को दिए अपने आदेश में अदालत ने कहा कि बच्चे स्वाभाविक रूप से शिक्षक पर अटूट भरोसा जताते हैं। इस भरोसे के साथ शिक्षक का यह नैतिक और कानूनी कर्तव्य बनता है कि वे बच्चे की रक्षा करें, न कि उनके विश्वास का फायदा उठाएं। कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि अपनी ही बेटी की उम्र की बच्ची के खिलाफ अधिकार का दुरुपयोग करना बेहद गंभीर मामला है और इसे केवल अनुशासन या शिष्टाचार का मामूली उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

स्कूलों की जिम्मेदारी और सुरक्षित माहौल

हाईकोर्ट ने शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया कि वे बच्चों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करें और ऐसा माहौल तैयार करें जहां छात्र डर, असहजता या असुरक्षा महसूस होने पर खुलकर अपनी बात रख सकें। अदालत ने कहा कि जब भी कोई बच्चा अनुचित व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे यह अहसास नहीं होना चाहिए कि उसने कोई गलती की है, बल्कि उसे पूरा समर्थन और प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

मामले का घटनाक्रम और निचली अदालत का फैसला

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यह मामला 11 अगस्त 2016 को दर्ज हुई एक औपचारिक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें पीड़ित नाबालिग छात्रा ने आरोप लगाया था कि शिक्षक ने स्कूल परिसर के भीतर ही कई मौकों पर उसके साथ गलत व्यवहार किया था।

जांच के बाद दिल्ली की एक निचली अदालत ने इसी साल 16 अप्रैल को आरोपी को पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत गंभीर यौन हमले और आईपीसी की धाराओं में दोषी ठहराया था। इसके बाद मई में अदालत ने उसे पांच साल के कारावास की सजा सुनाई थी। इस मामले में समय पर अधिकारियों को घटना की सूचना न देने के आरोप में स्कूल के प्रधानाचार्य पर भी मुकदमा चलाया गया था।

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बचाव पक्ष और अभियोजन की दलीलें

अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील एसके रघुवंशी और ए देब कुमार ने घटना की तारीख और स्थान को लेकर बयानों में विसंगतियां होने का दावा किया। उन्होंने आरोपी की 65 वर्ष की आयु, स्वास्थ्य समस्याओं और कुछ गवाहों के समर्थन न करने का हवाला देकर सजा में राहत देने की मांग की।

इसके जवाब में राज्य के वकील दिगम सिंह डागर ने तर्क दिया कि कुछ गवाहों के समर्थन न करने या तारीखों में मामूली अंतर से पीड़िता का मुख्य आरोप प्रभावित नहीं होता। हाईकोर्ट ने अभियोजन के पक्ष से सहमति जताई और कहा कि पीड़िता का बयान उन स्थानों के बारे में पूरी तरह सुसंगत रहा है जहां उसके साथ उत्पीड़न हुआ था। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए पूर्व शिक्षक की याचिका खारिज कर दी।

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