सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के 2023 के विधानसभा चुनाव को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि याचिका दायर करने में हुई कथित देरी और कानूनी समयसीमा से जुड़ा विवाद अब ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तय करेगा।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि उसे इस स्तर पर दखल देने का कोई आधार नजर नहीं आता। पीठ ने स्पष्ट किया कि तारीखों की सत्यता और उनके कानूनी प्रभाव को गवाही व सबूतों के जरिए परखा जाना जरूरी है, लिहाजा हाईकोर्ट कानून के अनुसार समयसीमा (लिमिटेशन) के बिंदु का निपटारा कर सकता है।
हलफनामे में देरी और 45 दिनों की मियाद पर दलीलें
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा ने याचिका को शुरुआती स्तर पर ही निरस्त करने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि भाजपा नेता विजय बघेल द्वारा दायर यह चुनौती लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81 के तहत बाधित है, जो चुनाव को चुनौती देने के लिए 45 दिनों की अनिवार्य मियाद तय करती है।
अदालत के रिकॉर्ड की ओर ध्यान दिलाते हुए सिब्बल ने कहा कि चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद 45 दिनों की समयसीमा 17 जनवरी 2024 को खत्म हो गई थी, जबकि विजय बघेल के हलफनामे पर 22 जनवरी 2024 की तारीख दर्ज है। सिब्बल ने सवाल उठाया कि निर्धारित समय पर हलफनामा दाखिल किए बिना चुनाव याचिका कैसे आगे बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि वैधानिक समयसीमा का मामला वाद की मूल जड़ से जुड़ा है, जिसे सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के तहत किसी भी चरण में उठाया जा सकता है।
शुरुआती चरण में आपत्ति न उठाने पर पीठ का सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा कि याचिका दायर करने की समयसीमा से जुड़ा यह सवाल अदालती प्रक्रिया के शुरुआती दौर में क्यों नहीं उठाया गया। सिब्बल ने स्वीकार किया कि यह आधार इस स्तर पर सामने लाया जा रहा है, लेकिन उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि कानून स्पष्ट होने की स्थिति में इस देरी को उनके मुवक्किल के खिलाफ न माना जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि बाद की तारीख वाला हलफनामा रिकॉर्ड का हिस्सा है। पीठ ने दस्तावेज के रिकॉर्ड में होने की बात दर्ज की, लेकिन दोहराया कि यह पहलू प्रारंभिक स्तर पर याचिका खारिज करने के बजाय ट्रायल में तय किए जाने योग्य है।
आचार संहिता उल्लंघन के आरोप और अदालती प्रक्रिया का इतिहास
यह विवाद भाजपा नेता विजय बघेल द्वारा पाटन विधानसभा क्षेत्र से भूपेश बघेल के निर्वाचन को रद्द कराने की मांग को लेकर दायर चुनाव याचिका से जुड़ा है। भाजपा नेता का आरोप है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने मतदान से पहले अनिवार्य 48 घंटे के साइलेंस पीरियड का उल्लंघन करते हुए क्षेत्र में जुलूस निकाला था।
यह कानूनी लड़ाई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच कई चरणों से गुजर चुकी है। इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 के तहत याचिका खारिज करने की अर्जी नामंजूर कर दी थी। बाद में जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भूपेश बघेल को अपनी पूर्व याचिका वापस लेकर चुनाव अधिकरण के रूप में कार्यरत हाईकोर्ट के समक्ष याचिका की विचारणीयता पर आपत्तियां रखने की अनुमति दी थी।
इसके बाद जून 2026 में हाईकोर्ट ने एक बार फिर प्रारंभिक स्तर पर याचिका खारिज करने से इनकार करते हुए कहा कि मामले में उठाए गए कई बिंदुओं की जांच साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल के दौरान आवश्यक है। फिलहाल यह चुनाव याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लंबित है, जहां गवाहियां और सबूत दर्ज किए जाने हैं।

