दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस अजय दिगपॉल ने रोहिणी स्थित कमर्शियल ट्रायल कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें एक सिविल मुकदमे को समरी जजमेंट के तहत खारिज करने से इनकार कर दिया गया था। उस मुकदमे में कुल 1 करोड़ रुपये के दो चेक को अमान्य और शून्य (नल एंड वॉइड) घोषित करने की मांग की गई है। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि जब चेक को लेकर पहले से ही नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत आपराधिक कार्यवाही चल रही हो, तब ऐसे चेक को शून्य घोषित कराने के लिए दायर सिविल मुकदमे की पोषणीयता (मेन्टेनबिलिटी) न्यायिक विचार का विषय है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद रोहिणी कोर्ट्स, नई दिल्ली के जिला जज (कमर्शियल कोर्ट-02), उत्तर जिला के समक्ष लंबित कमर्शियल सूट संख्या सीएस (कॉम) 325/2024 से जुड़ा है। यह मुकदमा वादी डॉ. दिनेश करगवाल ने प्रतिवादी डॉ. एम.एल. परनामी के खिलाफ दायर किया था।
मुकदमे में डॉ. करगवाल ने 5 अप्रैल 2024 की तारीख वाले दो चेकों—स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, किंग्सवे कैंप शाखा का 50 लाख रुपये का चेक (चेक संख्या 718453) और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, नेहरू एन्क्लेव, अलीपुर शाखा का 50 लाख रुपये का चेक (चेक संख्या 364056)—को निष्प्रभावी और शून्य घोषित करने की डिक्री मांगी थी। इसके अलावा, उन्होंने नरेला स्थित प्लॉट संख्या 23, पॉकेट-3, सेक्टर-ए9 में बन रहे अस्पताल भवन में उपयोग की गई निर्माण सामग्री व उपकरणों के मूल बिल, वारंटी कार्ड, वार्षिक रखरखाव अनुबंध (एएमसी) और खातों का विवरण सौंपने के लिए मेंडेटरी इंजंक्शन तथा 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 38,12,476 रुपये की वसूली की मांग भी की थी।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान डॉ. परनामी ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 13-ए के तहत अर्जी दाखिल कर वाद को संक्षेप में (समरी तौर पर) खारिज करने की मांग की। उनका कहना था कि दोनों चेक 12 जून 2023 को हुए हिसाब-किताब के निपटारे के बाद दिए गए थे, जिसके अनुसार उनके पक्ष में 1,52,29,928 रुपये की देनदारी बकाया थी। उन्होंने डॉ. करगवाल के इस दावे को खारिज किया कि ये चेक नवंबर 2021 में अस्पताल निर्माण परियोजना के लिए बतौर सिक्योरिटी डिपॉजिट दिए गए थे।
ट्रायल कोर्ट ने 1 अगस्त 2026 को सीपीसी के आदेश 13-ए के तहत दायर अर्जी को खारिज करते हुए कहा:
“उपरोक्त कानूनी सिद्धांतों के आधार पर, यदि अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि वादी के अपने दावे में सफल होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है, तो वह वादी के खिलाफ भी समरी जजमेंट पारित कर सकती है। ऐसा न्यायिक संतोष पक्षों के अभिवचनों से उभरने वाले तथ्यों के सार्थक पठन पर आधारित होना चाहिए। यह विवेक मनमाना या रिकॉर्ड के विपरीत नहीं हो सकता। यदि वर्तमान मामले के तथ्यों पर गौर किया जाए, तो इस अदालत का स्पष्ट मानना है कि सीपीसी के आदेश 13-ए को लागू करके मुकदमे को सीधे तौर पर समरी जजमेंट द्वारा खारिज नहीं किया जा सकता। पहला कारण यह है कि भले ही वादी द्वारा दोनों चेक जारी किए जाने की बात स्वीकार की गई हो, लेकिन क्या वे वर्ष 2021 में बतौर सिक्योरिटी दिए गए थे या नहीं, इसके लिए साक्ष्य की आवश्यकता है। भले ही बैंकिंग रिकॉर्ड से यह साबित होता हो कि वे चेक वर्ष 2021 में जारी नहीं किए जा सकते थे क्योंकि प्रतिवादी के अनुसार चेक बुक बाद में जारी हुई थी, किंतु इस तथ्य का फैसला भी रिकॉर्ड पर साक्ष्य लिए बिना नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, दोनों डॉक्टरों के बीच उनकी सटी हुई जमीन पर अस्पताल की इमारत बनाने को लेकर आपसी विवाद है और निर्माण शुरू होने से पहले कोई लिखित समझौता भी नहीं हुआ था। इसलिए उनके विवाद में कई जटिल तथ्यात्मक मुद्दे शामिल हैं, जो केवल दो चेकों के जारी होने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़े हैं। अतः सीपीसी के आदेश 13-ए के तहत न्यायिक विवेक के प्रयोग का कोई आधार नहीं बनता। तदनुसार अर्जी खारिज की जाती है।”
ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ डॉ. परनामी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता डॉ. परनामी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.डी. गुप्ता और अधिवक्ता अतुल गुप्ता पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने आदेश 13-ए सीपीसी की अर्जी खारिज करने में गंभीर त्रुटि की है। उन्होंने कहा कि दोनों चेकों के अनादर (बाउंस) होने के बाद याचिकाकर्ता ने मई 2024 में एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। इसके जवाब में वादी ने यह सिविल मुकदमा मात्र एक ‘काउंटर ब्लास्ट’ के रूप में दायर किया है।
याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि चेकों को शून्य घोषित कराने की मांग वास्तव में याचिकाकर्ता को एनआई एक्ट के तहत मिले वैधानिक अधिकारों और कानूनी उपायों का इस्तेमाल करने से रोकने का परोक्ष प्रयास है।
अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले फ्रॉस्ट (इंटरनेशनल) लिमिटेड बनाम मिलन डेवलपर्स एंड बिल्डर्स (पी) लिमिटेड (2022) का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट के रत्ना कमर्शियल एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम वासुटेक लिमिटेड मामले का उल्लेख किया था, जिसमें विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट) की धारा 41(डी) का विश्लेषण किया गया है। धारा 41(डी) किसी व्यक्ति को आपराधिक कार्यवाही शुरू करने या चलाने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) देने पर रोक लगाती है।
वकील ने बताया कि रत्ना कमर्शियल मामले में मद्रास हाईकोर्ट के एन.पी. एसप्पा चेट्टियार, इलाहाबाद हाईकोर्ट के गौरी शंकर बनाम डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ऑफ फर्रुखाबाद, गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के अरिस्टो प्रिंटर्स (पी) लिमिटेड बनाम पूर्वांचल ट्रेड सेंटर (जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मदन गोपाल रूंगटा और कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड फैसलों का संदर्भ था) तथा दिल्ली हाईकोर्ट के अतुल कुमार सिंह बनाम जलवीन रोशा फैसलों पर भरोसा जताया गया था। इन सभी निर्णयों में स्पष्ट किया गया है कि सिविल अदालतें ऐसी कोई निषेधाज्ञा जारी नहीं कर सकतीं, जो चेक बाउंस के मामलों में आपराधिक अदालत के अधिकारों को बाधित करे या आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही को रोके।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और अंतरिम निर्देश
याचिकाकर्ता की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस दिगपॉल ने माना कि आपराधिक कार्यवाही के समानांतर चेक को शून्य घोषित कराने वाले सिविल दावे की स्वीकार्यता की समीक्षा जरूरी है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“प्रथम दृष्टया, और याचिकाकर्ता के वकील को सुनने के पश्चात, इस अदालत का मानना है कि चेक संख्या 718453 और संख्या 364056 को शून्य घोषित कराने की मांग वाले प्रतिवादी के दावे की पोषणीयता का प्रश्न विचारणीय है।”
इसके आधार पर हाईकोर्ट ने रोहिणी कमर्शियल कोर्ट के 1 अगस्त 2026 के आदेश के क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई की तारीख तक रोक लगा दी। अदालत ने प्रोसेस फीस जमा करने के बाद एक सप्ताह के भीतर प्रतिवादी को सभी अनुमत माध्यमों से नोटिस जारी करने का निर्देश दिया, जिसे 16 फरवरी 2027 के लिए तय किया गया है।
हाईकोर्ट ने प्रतिवादी को नोटिस तामील होने के चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने की छूट दी है, जिसकी अग्रिम प्रति याचिकाकर्ता के वकील को देनी होगी। इसके बाद याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर प्रत्युत्तर (रिजॉइंडर) दाखिल करने की अनुमति दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 16 फरवरी 2027 को होगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: डॉ. एम.एल. परनामी बनाम डॉ. दिनेश करगवाल
वाद संख्या: सीएम(एम) 2126/2026 और सीएम एपीपीएल. 66034/2026
पीठ: जस्टिस अजय दिगपॉल
निर्णय की तिथि: 24 सितंबर, 2026

