पूर्व जानकारी के बिना आपराधिक मामले की जानकारी न देना ‘तथ्य छिपाना’ नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सर्विस कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा है कि जब तक यह साबित न हो जाए कि उम्मीदवार को लंबित आपराधिक मामले की पूर्व जानकारी थी, तब तक उसे गलत घोषणा करने या जानकारी छिपाने का दोषी नहीं माना जा सकता। ‘द फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड’ (एफ.ए.सी.टी.) के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह ने पीठ की ओर से निर्णय दिया कि कर्मचारी को 50% पिछले वेतन के साथ तुरंत सेवा में बहाल किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता शत्रुघ्न यादव को 5 मई 2021 को ‘द फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड’ (एफ.ए.सी.टी.) में तकनीशियन (प्रोसेस) के पद पर दो साल के शुरुआती कार्यकाल के लिए समेकित वेतन पर नियुक्त किया गया था। कार्यभार संभालते समय उन्होंने एक सत्यापन फॉर्म भरा, जिसमें उन्होंने घोषणा की कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है।

नियुक्ति के छह महीने बाद, नियोक्ता ने कर्मचारी के आपराधिक रिकॉर्ड के सत्यापन के लिए जिला मजिस्ट्रेट को पत्र भेजा। 22 मार्च 2022 को जिला मजिस्ट्रेट ने सूचित किया कि अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323 और 504 के तहत 3 अप्रैल 2019 को एक गैर-संज्ञेय रिपोर्ट (एनसीआर) दर्ज की गई थी। इसके आधार पर कंपनी ने 30 अप्रैल 2022 को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि गलत जानकारी देने के लिए उनकी सेवाएं क्यों न समाप्त कर दी जाएं।

अपने जवाब में अपीलकर्ता ने स्पष्ट किया कि उन्होंने सद्भावनापूर्वक कार्य किया था और कोई जानकारी नहीं छिपाई, क्योंकि उन्हें एनसीआर दर्ज होने की कोई जानकारी ही नहीं थी। उन्हें न तो कोई समन मिला था और न ही कभी पुलिस स्टेशन बुलाया गया या गिरफ्तार किया गया था। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने पुलिस अधीक्षक, जिला महाराजगंज द्वारा जारी 9 जुलाई 2020 का चरित्र प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल रिकॉर्ड नहीं था। बाद में 6 जून 2023 को उन्होंने एक पुलिस रिपोर्ट भी पेश की, जिससे पुष्टि हुई कि जांच में कोई सबूत न मिलने के कारण उनका नाम आरोपियों की सूची से हटा दिया गया है।

इसके बावजूद, कंपनी ने 5 अगस्त 2023 को बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया। अपीलकर्ता ने इसे केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि अज्ञानता का दावा एक विवादित तथ्यात्मक प्रश्न है। केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी 4 जुलाई 2025 को इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट यह देखने में विफल रहा कि क्या उम्मीदवार की ओर से जानबूझकर जानकारी छिपाई गई थी या महज जानकारी न होना (नॉन-डिक्लोजर सिम्प्लीसीटर) था। रविंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अवतार सिंह बनाम भारत संघ के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि आपराधिक मामले का अस्तित्व अपने आप में बर्खास्तगी का आधार नहीं बन सकता। अपीलकर्ता ने अपनी जानकारी के अनुसार सत्य घोषणा की थी और हाईकोर्ट को केवल विवादित तथ्यों का हवाला देकर रिट याचिका खारिज नहीं करनी चाहिए थी।

दूसरी ओर, एफ.ए.सी.टी. के वकील ने तर्क दिया कि जानकारी न देने से उम्मीदवार सेवा के लिए अयोग्य हो जाता है। कंपनी ने दावा किया कि यह असंभव है कि अपीलकर्ता को एनसीआर की जानकारी न हो, क्योंकि इसमें उनके माता-पिता का नाम भी शामिल था। इसके अलावा, कंपनी का तर्क था कि अपीलकर्ता को रिट याचिका दायर करने के बजाय औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत उपलब्ध विकल्पों का उपयोग करना चाहिए था।

कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी मिसालें

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले कंपनी की प्राथमिक आपत्ति को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत वैकल्पिक उपाय का होना रिट अधिकार क्षेत्र के प्रयोग में पूर्ण बाधा नहीं बनता, खासकर जब बर्खास्तगी आदेश की वैधता को चुनौती दी गई हो।

मूल कानूनी मुद्दे पर पीठ ने अवतार सिंह बनाम भारत संघ मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले का हवाला देते हुए मुख्य सिद्धांत को रेखांकित किया:

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“38.11. किसी व्यक्ति को तथ्य छिपाने (सप्रेजियो वेरी) या झूठा बयान देने (सजेस्टियो फाल्सी) का दोषी ठहराए जाने से पहले, उस तथ्य की जानकारी का श्रेय उसे दिया जाना आवश्यक है।”

अदालत ने जोर देकर कहा कि नियोक्ता को यांत्रिक तरीके से काम करने के बजाय अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए। रविंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और उमेश चंद्र यादव बनाम महानिरीक्षक एवं मुख्य सुरक्षा आयुक्त, रेलवे सुरक्षा बल का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि शक्तियों का प्रयोग तर्कसंगत और वस्तुनिष्ठ तरीके से किया जाना चाहिए। उमेश चंद्र यादव मामले का हवाला देते हुए पीठ ने उद्धृत किया:

“14. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जो उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में भाग लेना चाहते हैं, उन्हें सेवा में शामिल होने से पहले या बाद में सत्यापन फॉर्म में अपने चरित्र और पूर्ववृत्त से संबंधित सही जानकारी देनी होती है। साथ ही, यह भी सच है कि जिस व्यक्ति ने महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई है, वह नियुक्ति या सेवा में निरंतरता पाने के निर्बाध अधिकार का दावा नहीं कर सकता। लेकिन इसके साथ ही, उसे मनमाने ढंग से निपटे न जाने का अधिकार है और प्राधिकारी को उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखते हुए निष्पक्षता और तर्कसंगत तरीके से शक्ति का प्रयोग करना होगा। लागू किया जाने वाला मापदंड हमेशा पद की प्रकृति, कर्तव्यों की प्रकृति और छिपाव के प्रभाव पर निर्भर करता है और इस संबंध में कोई कठोर नियम तय नहीं किया जा सकता।”

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि किसी कर्मचारी को जानकारी छिपाने के आरोप में बर्खास्त करने से पहले नियोक्ताओं को दो-स्तरीय जांच करनी चाहिए:

  1. तथ्यात्मक जांच: क्या उस समय उम्मीदवार की जानकारी और परिस्थितियों को देखते हुए वास्तव में कोई तथ्य छिपाया गया था या गलत जानकारी दी गई थी।
  2. विवेक का प्रयोग: क्या नियोक्ता ने अपराध की गंभीरता, पद के कर्तव्यों और आपराधिक कार्यवाही के अंतिम परिणाम जैसी विशिष्ट परिस्थितियों पर विचार किया कि क्या बर्खास्तगी ही एकमात्र विकल्प है।
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वर्तमान मामले में इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने पाया कि अपीलकर्ता ने विश्वसनीय दस्तावेजों के माध्यम से अपनी अज्ञानता साबित की है, जिसमें पुलिस प्रमाण पत्र भी शामिल हैं जो बताते हैं कि उन्हें कभी समन नहीं भेजा गया या गिरफ्तार नहीं किया गया। माता-पिता के शामिल होने के आधार पर जानकारी होने के कंपनी के दावे को अदालत ने केवल अटकलबाजी करार देते हुए टिप्पणी की:

“कहने की आवश्यकता नहीं है कि किसी तथ्य को न बताने के लिए उसकी जानकारी होना एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है। छिपाने की अवधारणा स्वयं उस बात की जागरूकता को दर्शाती है जिसे छिपाया गया है; कोई व्यक्ति उस चीज को रोकने या छिपाने का दोषी नहीं हो सकता जिसकी उसे पहले स्थान पर कोई जानकारी ही नहीं थी। किसी उम्मीदवार को ऐसी जानकारी छिपाने के लिए उत्तरदायी ठहराना तर्कहीन और अन्यायपूर्ण होगा जो शुरू से ही उसके ज्ञान में थी ही नहीं।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि अज्ञानता साबित करने की जिम्मेदारी ठोस सामग्री के साथ उम्मीदवार पर होती है, जिसे अपीलकर्ता ने पूरा किया।

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बर्खास्तगी का आदेश अवैध और पोषणीय नहीं है। इसके परिणामस्वरूप, अदालत ने केरल हाईकोर्ट के फैसलों और 5 अगस्त 2023 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कंपनी को निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को सभी आनुषंगिक लाभों के साथ तुरंत सेवा में बहाल किया जाए। पिछला वेतन 50% तक सीमित रहेगा, जिसका भुगतान आठ सप्ताह के भीतर किया जाएगा; ऐसा न करने पर देय तिथि से भुगतान तक 6% वार्षिक ब्याज लागू होगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: शत्रुघ्न यादव बनाम द फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड (एफ.ए.सी.टी.) एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या ______ / 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 7197 / 2026 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 11 अगस्त 2026

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