कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई संतान गंभीर शारीरिक दिव्यांगता से पीड़ित है और अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो उसके बालिग होते ही दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 की धारा 125 के तहत पिता का भरण-पोषण दायित्व स्वतः समाप्त नहीं होता। हाईकोर्ट के एकल पीठ के जस्टिस उदय कुमार ने एक पिता की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (क्रिमिनल रिवीजनल एप्लिकेशन) को खारिज कर दिया। याचिका में निचली अदालत के उन दो अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनके जरिए 70 प्रतिशत शारीरिक रूप से दिव्यांग बालिग बेटे की ओर से मां द्वारा सीआरपीसी की धारा 127 के तहत दायर अर्जी को सुनवाई योग्य माना गया था। निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को लंबित निष्पादन (एग्जिक्यूशन) मामलों को शीघ्र निपटाने और बिना किसी अनुचित स्थगन के साक्ष्य दर्ज करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 2005 में शुरू हुआ था, जब मां ने अपने और अपने 20 नवंबर 2001 को जन्मे बीमार व नाबालिग बेटे के लिए भरण-पोषण की मांग करते हुए मजिस्ट्रेट अदालत में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मिस. केस संख्या 163/2005 दाखिल किया था। अर्जी में पिता द्वारा उनकी उपेक्षा करने और भरण-पोषण से इनकार करने का आरोप लगाया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने 6 जुलाई 2012 को दिए अपने फैसले में मां के व्यक्तिगत भरण-पोषण के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पति की पूर्व में 1992-1993 की वैध शादी के अस्तित्व में रहते हुए दूसरा विवाह होने के कारण यह विवाह शून्य था। हालांकि, अदालत ने दिव्यांग बेटे के वैधानिक अधिकार को मान्यता देते हुए पिता को प्रति माह 3,000 रुपये भरण-पोषण भत्ता देने का निर्देश दिया। पिता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे 22 नवंबर 2016 को सीआरआर संख्या 77/2014 में हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने खारिज करते हुए बेटे के अधिकार पर मुहर लगा दी थी।
बेटे के बालिग होने के बाद, मां ने न्यायिक मजिस्ट्रेट (तृतीय न्यायालय, राणाघाट, नादिया) के समक्ष सीआरपीसी की धारा 127 के तहत अर्जी (मिस. केस संख्या 388/2018) दायर कर भरण-पोषण जारी रखने और उसमें संशोधन की मांग की। मां का कहना था कि बेटा 70 से 75 प्रतिशत ऑर्थोपेडिक दिव्यांगता से ग्रसित है और अपनी आजीविका चलाने में पूरी तरह असमर्थ है। पिता ने इस अर्जी का कड़ा विरोध करते हुए 20 अगस्त 2019 और 28 अक्टूबर 2022 को याचिकाएं देकर मामले की पोषणीयता (मेंटेनेबिलिटी) पर सवाल उठाया। पिता का तर्क था कि बेटा बालिग हो चुका है, उसने 12वीं की परीक्षा पास कर ली है, आईटीआई (ITI) का वोकेशनल कोर्स कर रहा है और बिना किसी सहारे के चल सकता है; लिहाजा मां को उसके नाम पर धारा 127 के तहत कार्यवाही चलाने का कोई कानूनी अधिकार (लोकस स्टैंडाई) नहीं है।
मजिस्ट्रेट अदालत ने 31 मार्च 2022 और 10 जनवरी 2023 को पिता की आपत्तियों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125(1) का दूसरा परंतुक उन बालिग बच्चों को सुरक्षा देता है जो शारीरिक या मानसिक विकृति के कारण अपना भरण-पोषण करने में अक्षम हैं। अदालत ने यह भी माना कि मां प्राकृतिक अभिभावक के रूप में उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए सक्षम है और बार-बार निराधार आपत्तियां दाखिल कर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए पिता पर 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया। इसके बाद पिता ने सीआरपीसी की धारा 407 सहपठित धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता-पिता के वकील ने तर्क दिया कि बालिग होते ही बेटा कानूनी रूप से समर्थ (सुई ज्यूरिस) हो गया, जिससे मां का उसके बदले धारा 127 के तहत अर्जी दाखिल करने का अधिकार खत्म हो गया। उन्होंने कहा कि धारा 127 केवल मौजूदा भत्ते में बदलाव की अनुमति देती है, और चूंकि बालिग होने पर भरण-पोषण का अधिकार अपने आप समाप्त हो जाता है, इसलिए एक नई मूल कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए थी। इसके अलावा, वकील ने सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा और अदिति उर्फ मीठी बनाम जितेश शर्मा के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा अनिवार्य न करने से पूरी कार्यवाही दूषित हो गई है। उन्होंने यह भी दलील दी कि बेटे का खुद चल पाना और आईटीआई में पढ़ाई करना यह साबित करता है कि वह पूरी तरह अक्षम नहीं है, और विवाह अमान्य घोषित होने के बाद मां द्वारा यह कार्यवाही दुर्भावना से शुरू की गई है।
दूसरी तरफ, मां और बेटे के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह रिवीजन याचिका एक आदतन बकाएदार पिता द्वारा अपने वैधानिक दायित्वों से बचने के लिए अपनाई गई एक टालमटोल की रणनीति है। उन्होंने बताया कि धारा 125(1)(c) स्पष्ट रूप से उन बालिग संतानों को संरक्षण देती है जो शारीरिक या मानसिक विषमता के कारण अपना भरण-पोषण नहीं कर सकतीं। मेडिकल प्रमाणपत्रों के जरिए बेटे की 70 से 75 प्रतिशत दिव्यांगता पहले से ही रिकॉर्ड पर स्थापित है और एक मां देखभालकर्ता के रूप में ऐसे दिव्यांग बालिग के हक के लिए कानूनी कदम उठा सकती है। वकील ने यह भी स्पष्ट किया कि रजनेश बनाम नेहा और अदिति उर्फ मीठी बनाम जितेश शर्मा के दिशा-निर्देश नए मुकदमों में भरण-पोषण की राशि तय करने के लिए हैं; उन्हें पहले से तय भरण-पोषण आदेश को रोकने के लिए एक तकनीकी ढाल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पिता पर 2019 से 2024 तक का बकाया न चुकाने के कारण कई निष्पादन मामले और गिरफ्तारी वारंट लंबित हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस उदय कुमार ने मामले में तीन मुख्य कानूनी सवाल तय किए: क्या किसी दिव्यांग बालिग संतान के 70 प्रतिशत अक्षम होने और भरण-पोषण में असमर्थ होने के बावजूद धारा 125(1)(c) के तहत पिता का दायित्व बालिग होते ही खत्म हो जाता है; क्या रजनेश बनाम नेहा और अदिति उर्फ मीठी बनाम जितेश शर्मा के तहत संपत्ति हलफनामा न लिया जाना पहले से तय भरण-पोषण की पोषणीयता से जुड़े अंतरिम आदेश को दूषित करता है; और क्या ट्रायल कोर्ट के आदेशों में ऐसा कोई कानूनी दोष है जिसमें रिवीजनल अधिकार क्षेत्र के तहत हस्तक्षेप किया जाए।
सीआरपीसी की धारा 125(1)(c) और धारा 127 के दायरे पर विचार करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि धारा 125 मुख्य रूप से नाबालिगों से संबंधित है, लेकिन इसका वैधानिक परंतुक उन बालिग बच्चों (विवाहित बेटी को छोड़कर) के लिए एक महत्वपूर्ण अपवाद बनाता है जो शारीरिक या मानसिक विकृति अथवा चोट के कारण अपना गुजारा करने में असमर्थ हैं। पिता की दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह मानना कि बालिग होने की निर्धारित आयु सीमा पार करते ही भरण-पोषण देने का दायित्व अपने आप समाप्त हो जाता है और किसी गंभीर रूप से दिव्यांग व्यक्ति को नए सिरे से मुकदमा शुरू करना होगा, इस वैधानिक प्रावधान की उपचारात्मक भावना को गलत समझना है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि बालिग होने के साथ-साथ 70 से 75 प्रतिशत ऑर्थोपेडिक दिव्यांगता का बना रहना कानूनी और शारीरिक स्थिति में एक बड़ा बदलाव है, जिसे धारा 127 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण आदेश में संशोधन और निरंतरता के जरिए आसानी से देखा जा सकता है। बेटे की वोकेशनल ट्रेनिंग और चलने की क्षमता को लेकर पिता के दावों पर अदालत ने कहा:
“याचिकाकर्ता के तर्क के अनुसार, केवल आईटीआई (ITI) की तकनीकी योग्यता हासिल कर लेना या बिना किसी सहारे के खुद चल पाने की शारीरिक क्षमता होना, रोजगार पाने की क्षमता, आर्थिक स्वतंत्रता या प्रतिस्पर्धी सामाजिक-आर्थिक माहौल में खुद का भरण-पोषण करने की क्षमता के बराबर नहीं है।”
मां के कानूनी अधिकार (लोकस स्टैंडाई) पर उठाई गई आपत्ति को खारिज करते हुए पीठ ने कहा:
“70 से 75 फीसदी तक की ऑर्थोपेडिक दिव्यांगता से जूझ रहे व्यक्ति को प्रक्रियागत तकनीकी बारीकियों के आधार पर न्याय के दरवाजों से बाहर नहीं किया जा सकता। किसी दिव्यांग बालिग के अधिकारों की रक्षा के लिए एक हितैषी (नेक्स्ट फ्रेंड) के तौर पर माता-पिता या करीबी रिश्तेदार का आगे आना न्याय तक पहुंच का एक स्थापित पहलू है।”
सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा और अदिति उर्फ मीठी बनाम जितेश शर्मा के फैसलों के संदर्भ में हाईकोर्ट ने माना कि संपत्ति के हलफनामे से जुड़े दिशा-निर्देश उन विवादों के लिए हैं जहां पक्षकार अपनी आय छिपाते हैं और नए मुकदमों में वित्तीय क्षमता का आकलन करना होता है। इस मामले में भरण-पोषण की राशि 2012 से ही 3,000 रुपये प्रति माह तय थी, जिसे 2016 में हाईकोर्ट भी बरकरार रख चुका था। यह देखते हुए कि धारा 127 की कार्यवाही किसी भारी वृद्धि के लिए नहीं की गई थी, अदालत ने कहा:
“सीआरपीसी की धारा 127 के तहत कार्यवाही पति की आय में अचानक भारी उछाल के आधार पर भरण-पोषण की राशि में अत्यधिक वृद्धि की मांग के लिए नहीं थी; बल्कि यह एक बेसहारा दिव्यांग बालिग को दर-दर की ठोकरें खाने से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच थी।”
अदालत ने बार-बार एक जैसी आपत्तियां उठाने को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। भरण-पोषण के दायित्व की समय-सीमा स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“पिता अपने गंभीर रूप से दिव्यांग बालिग बेटे का तब तक भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है, जब तक कि दिव्यांगता बनी रहती है और बेटा अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ रहता है, लेकिन संहिता की धारा 127 परिस्थितियों में वास्तविक और ठोस बदलाव आने पर आदेश में संशोधन या उसे रद्द करने का एक खुला रास्ता भी देती है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी बदलाव या आदेश रद्द करने के लिए खुले बाजार में वास्तविक रोजगार और आत्मनिर्भरता का ठोस प्रमाण देना होगा, न कि तकनीकी योग्यताओं के आधार पर अटकलें लगाना।
हाईकोर्ट का निर्णय
मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश में अधिकार क्षेत्र की कोई त्रुटि या अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने सीआरआर संख्या 534/2023 को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट के 31 मार्च 2022 और 10 जनवरी 2023 के आदेशों को पूरी तरह सही ठहराया।
हाईकोर्ट ने अपने सभी अंतरिम आदेशों को वापस लेते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह लंबित निष्पादन मामलों में तेजी लाए, बकाए और जुर्माने के भुगतान का कड़ाई से पालन कराए और याचिकाकर्ता-पिता को कोई भी गैर-जरूरी स्थगन दिए बिना गवाहियों और साक्ष्यों को तत्काल दर्ज करे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: समित प्रमाणिक बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य
वाद संख्या: सीआरआर 534 ऑफ 2023
पीठ: जस्टिस उदय कुमार
निर्णय की तिथि: 21.09.2026

