दिल्ली हाईकोर्ट ने 1990 के दशक के दुष्कर्म मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों के लगातार अच्छे जेल आचरण को आधार बनाते हुए उनकी तुरंत रिहाई का आदेश दिया है। अदालत ने सजा समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) और दिल्ली सरकार के गृह विभाग द्वारा समयपूर्व रिहाई की अर्जियों को खारिज करने के फैसलों को मनमाना बताते हुए रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने साफ किया कि केवल मूल अपराध की गंभीरता के आधार पर किसी कैदी को हमेशा के लिए रिहाई से वंचित नहीं रखा जा सकता।
चेखव के कथन का उल्लेख और कोर्ट का रुख
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने प्रसिद्ध रूसी लेखक अंतोन चेखव की चर्चित लघु कहानी ‘द बेट’ की पंक्तियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मृत्युदंड किसी व्यक्ति के जीवन को एक पल में समाप्त कर देता है, जबकि आजीवन कारावास उसकी जिंदगी को धीरे-धीरे खत्म करता है। उन्होंने सवाल उठाया कि कुछ ही मिनटों में जान लेने वाला जल्लाद अधिक मानवीय है या वह जो कई वर्षों में इंसान के भीतर से जीवन को धीरे-धीरे निचोड़ लेता है।
हाईकोर्ट ने 11 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि अगर जेल में खराब आचरण का कोई समकालीन प्रमाण न हो, तो लंबे समय के अच्छे व्यवहार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, दोबारा अपराध करने की आशंका का आकलन ठोस मनोवैज्ञानिक व व्यावहारिक जांच और जेल के रिकॉर्ड पर आधारित होना चाहिए, न कि गवाहों या पीड़ितों की निराधार आशंकाओं अथवा उम्र के सामान्य संदर्भों पर।
कैदियों की हिरासत का ब्योरा
याचिका दाखिल करने वाले दोनों कैदी दशकों पुराने मामलों में सजा भुगत रहे थे। पहला मामला 1992 के अपराध से जुड़ा है, जिसमें कैदी को उम्रकैद की सजा मिली थी। उसकी याचिका के मुताबिक, 3 जनवरी 2026 तक वह बिना छूट (रेमिशन) के 31 साल से ज्यादा की जेल काट चुका था, जबकि छूट मिलाकर उसकी कुल हिरासत 40 साल से अधिक हो जाती है।
वहीं दूसरा मामला 1997 का है। इस कैदी की याचिका के अनुसार, 6 अक्टूबर 2025 तक वह छूट के बिना 15 साल से अधिक जेल में बिता चुका था, जबकि छूट अवधि जोड़ने पर उसकी कुल हिरासत 19 साल से ज्यादा बनती है।
दोनों कैदियों ने अपने सुधरे हुए आचरण के बल पर समयपूर्व रिहाई की मांग की थी, लेकिन एसआरबी और गृह विभाग ने उनकी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
रिहाई के तय कानूनी पैमाने और वकीलों की दलीलें
मामले में अदालत की सहायता के लिए न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त की गईं वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने कहा कि समयपूर्व रिहाई के आवेदनों पर विचार करने के लिए स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश मौजूद हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि क्या कैदी जेल में अपने समग्र आचरण के चलते अपराध करने की प्रवृत्ति खो चुका है, क्या समाज के उपयोगी नागरिक के रूप में उसका पुनर्वास संभव है, और उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है।
एक कैदी की ओर से पेश अधिवक्ता सौजन्या शंकरन ने तर्क दिया कि एसआरबी का फैसला तय मापदंडों के विपरीत था। बोर्ड ने स्थापित नियमों और हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों का पालन करने के बजाय “हताशा में किया गया अपराध”, “समाज के विश्वास को झकझोरने वाला मामला” और “व्यापक जनहित के खिलाफ” जैसे सामान्य शब्दों का सहारा लेकर अर्जी खारिज कर दी।
दूसरे कैदी के वकील सार्थक माग्गोन ने अदालत में कहा कि अपराध की प्रकृति, क्रूरता या जघन्यता जैसे ऐतिहासिक तथ्य यह तय नहीं कर सकते कि रिहा होने के बाद कैदी का भविष्य में व्यवहार कैसा रहेगा।
राज्य सरकार का विरोध और अदालत का अंतिम फैसला
राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त स्थायी वकील संजीव भंडारी और अमोल सिन्हा ने एसआरबी के फैसले का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि बोर्ड ने बिना किसी एक ढर्रे (स्ट्रैट-जैकेट फॉर्मूले) पर निर्भर रहे सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया था। राज्य पक्ष का कहना था कि कैदियों द्वारा किए गए अपराध बर्बर थे, जो मानवीय गरिमा और सामाजिक मानदंडों की पूरी तरह अनदेखी करते हैं। ऐसे अपराध समाज की सामूहिक चेतना को झकझोरते हैं और नागरिकों में डर पैदा करते हैं। केवल लंबी सजा काटने के आधार पर रिहाई देने से समाज में गलत संदेश जाएगा।
तमाम तर्कों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि समयपूर्व रिहाई पर फैसला लेते समय मूल अपराध की जघन्यता और सजा की अवधि जैसे “स्थिर और ऐतिहासिक तथ्यों” को ही अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। यदि केवल इन्हीं को निर्णायक मान लिया जाए, तो कोई भी उम्रकैदी कभी समयपूर्व रिहाई का पात्र ही नहीं बन पाएगा।
अदालत ने पाया कि एसआरबी की यह आशंका कि कैदी बाहर आकर दोबारा अपराध कर सकते हैं, किसी भी मनोवैज्ञानिक या व्यवहार संबंधी अध्ययन पर आधारित नहीं थी। हाईकोर्ट ने बोर्ड के आदेशों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानते हुए दोनों कैदियों को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।

