जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें अपीलकर्ता के वकील की अनुपस्थिति में और उसकी पैरवी के लिए एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किए बिना ही आपराधिक अपील तय कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बरेली जिले के अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 763/2003 में 5 अक्टूबर 2005 को पारित फैसले से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता राम स्वरूप को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 324 के तहत दोषी ठहराया था।
दोषसिद्धि के खिलाफ अपीलकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील संख्या 4576/2005 दायर की। 30 मार्च 2026 को हाईकोर्ट ने इस अपील पर अपना फैसला सुना दिया। हालांकि, यह निर्णय अपीलकर्ता के वकील की अनुपस्थिति में और उनके बचाव के लिए कोई एमिकस क्यूरी नियुक्त किए बिना दिया गया था। इसके बाद अपीलकर्ता ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उचित कानूनी प्रतिनिधित्व के बिना अपील का फैसला करना प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।
अपीलकर्ता की ओर से मुख्य मांग यही की गई कि मामले को हाईकोर्ट वापस भेजा जाए ताकि वे अपनी अपील पर बहस के लिए वकील नियुक्त कर सकें। अपनी इस मांग के समर्थन में वकील ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा के. मुरुगानंदम एवं अन्य बनाम राज्य [(2021) 20 SCC 642] के मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया।
उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से पेश वकील ने अपीलकर्ता की इस मांग पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने वास्तव में अपीलकर्ता को सुने बिना और उनके लिए कानूनी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किए बिना ही फैसला सुना दिया था।
इस प्रक्रियात्मक चूक पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:
“रिकॉर्ड का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने के बाद, हमारी यह राय है कि चूंकि फैसला अपीलकर्ता को सुने बिना सुनाया गया है और उनकी ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ था, इसलिए इस मामले में दिया गया फैसला रद्द किए जाने योग्य है और इसे तदनुसार रद्द किया जाता है।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने देरी को माफ करते हुए विशेष अनुमति याचिका मंजूर की और 30 मार्च 2026 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही मामले को गुण-दोष के आधार पर पक्षों को सुनकर नए सिरे से तय करने के लिए वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया।
अदालत ने आरोपी के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निर्देश दिया:
“यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि अपीलकर्ता वकील नियुक्त करने में असमर्थ रहता है, तो हाईकोर्ट से अनुरोध किया जाता है कि वह उसकी ओर से प्रतिनिधित्व करने और बहस करने के लिए एक एमिकस क्यूरी नियुक्त करे।”
अदालत ने दोनों पक्षों को 24 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया और अपील का निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: राम स्वरूप बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) डायरी संख्या 42188/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 4 अगस्त 2026

