सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को गाना अनिवार्य बनाने और ऐसा न करने पर कानूनी सजा दिए जाने से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा करने पर सहमति जताई है। कर्नाटक संगीत के जाने-माने गायक टी. एम. कृष्णा की याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने फिलहाल केंद्र को कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया है।
धार्मिक स्वतंत्रता और दंडात्मक प्रावधानों की होगी पड़ताल
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने याचिकाकर्ता कृष्णा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि वह कानून के दंडात्मक पहलुओं की जांच कर सकती है।
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वंदे मातरम का देश का राष्ट्रीय गीत होना पूरी तरह संदेह से परे है और इसमें कोई दो राय नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी जोड़ा कि इसे अनिवार्य रूप से गाने और न गाने पर दंड देने के प्रावधानों की पड़ताल संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले मौलिक अधिकारों के दायरे में की जा सकती है।
संविधान का अनुच्छेद 25 और 26 देश के प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण की आजादी के साथ-साथ व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है।
याचिकाकर्ता ने उठाए धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल
गायक टी. एम. कृष्णा की याचिका में ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम’ (प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट) में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। इस संशोधन के जरिए राष्ट्रीय गीत के सभी छह पदों को गाना अनिवार्य किया गया है और इसका पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई का नियम बनाया गया है।
याचिका में दलील दी गई है कि वंदे मातरम के अंतिम चार पदों में स्पष्ट रूप से हिंदू देवी-देवताओं की वंदना की गई है। ऐसे में इन पदों को अनिवार्य रूप से गाने का नियम देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर चोट करता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह संशोधन पूरी तरह मनमाना है, नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करता है और एक बहुसंख्यकवादी धार्मिक संदेश को बढ़ावा देता है।

