मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना से जुड़ी बिजली बुनियादी ढांचा लाइन के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने पालघर जिले में 847 मैंग्रोव पेड़ काटने की अनुमति दे दी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अनखड की पीठ ने इस मामले को एक अपवाद मानते हुए स्पष्ट किया कि इस आदेश को भविष्य की परियोजनाओं के लिए नजीर नहीं माना जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि वनीकरण के नाम पर सैकड़ों किलोमीटर दूर पेड़ लगाना स्थानीय पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।
ठाणे में 26 हजार से ज्यादा मैंग्रोव लगाने के वादे पर मिली राहत
महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी (म्हाट्रांसको) ने बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के लिए आवश्यक 132 केवी ट्रांसमिशन लाइन और सबस्टेशन निर्माण हेतु 3.35 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन की मांग की थी। इसमें करीब दो हेक्टेयर मैंग्रोव भूमि भी शामिल है। अदालत ने इस परियोजना को राष्ट्रीय महत्व का मानते हुए मंजूरी दी, लेकिन यह फैसला कंपनी द्वारा दिए गए नए आश्वासनों के बाद ही आया। म्हाट्रांसको ने अदालत को वचन दिया कि वह सोलापुर जिले के सांगोला में 6.71 हेक्टेयर भूमि पर 7,457 सामान्य पेड़ लगाने की वैधानिक अनिवार्यता के अलावा, प्रभावित स्थल के निकट ठाणे में 26,664 मैंग्रोव पौधे लगाएगी।
दूर-दराज में पेड़ लगाने से स्थानीय नुकसान की भरपाई नहीं: हाईकोर्ट
इस मामले में याचिका का विरोध बॉम्बे एनवायर्नमेंटल एक्शन Group द्वारा किया गया था। संगठन का तर्क था कि पालघर में नष्ट हो रहे मैंग्रोव के बदले 400 किलोमीटर दूर सोलापुर में पेड़ लगाने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा नहीं हो सकती। हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के एम.सी. मेहता मामले का हवाला दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण का मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करना है, न कि केवल आंकड़ों की पूर्ति करना। अदालत के अनुसार, दूर किसी जिले में पौधे लगाने से सांख्यिकीय आवश्यकता तो पूरी हो सकती है, लेकिन प्रभावित इलाके का पर्यावरणीय नुकसान दूर नहीं होता।
महाराष्ट्र सरकार की ढिलाई पर कड़ी नाराजगी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की कार्यशैली पर भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने सितंबर 2025 में जारी प्रशासनिक निर्देशों का अब तक पालन नहीं किया है। इन निर्देशों के तहत सरकार को एफोरस्टेशन लैंड बैंक बनाने, वृक्षारोपण का डेटा सार्वजनिक करने और निगरानी तंत्र गठित करने का आदेश दिया गया था। पीठ ने इस देरी को प्रशासनिक उदासीनता और लगातार विफलता करार दिया। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि वे चार हफ्तों के भीतर इन सभी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करें, ताकि वनीकरण कार्यक्रम महज एक कागजी कसरत बनकर न रह जाएं।

