गौहाटी हाईकोर्ट ने असम में एक नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए आरोपी को बरी कर दिया है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि कितना भी गहरा संदेह क्यों न हो, वह कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता। मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
सबूतों के अभाव में बरी हुआ आरोपी
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या), 376A और पोक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद राज्य सरकार ने फांसी की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट में संदर्भ (रेफरेंस) भेजा था, वहीं आरोपी ने अपनी सजा के खिलाफ अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह से परिस्थितियों पर आधारित है और अपराध का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है।
‘आखिरी बार देखे जाने’ और इकबालिया बयान पर उठे सवाल
अदालत ने अभियोजन पक्ष के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि बच्ची को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि जिन दो गवाहों के बयान पर यह दावा किया गया था, उन्हें केवल सुनी-सुनाई बातें पता थीं और वे यह साबित करने में विफल रहे कि पीड़िता केवल आरोपी के साथ ही मौजूद थी।
इसके अलावा, पुलिस हिरासत में दर्ज कराए गए आरोपी के कथित इकबालिया बयान को भी अदालत ने अमान्य कर दिया। पीठ ने कहा कि यह बयान थाने में गवाहों को बुलाकर पुलिस हिरासत के दौरान दर्ज कराया गया था। साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 25 और 26 के तहत इसे किसी स्वतंत्र व्यक्ति के सामने दिया गया स्वेच्छाचार बयान नहीं माना जा सकता।
फॉरेंसिक साक्ष्यों की कमी और मेडिकल रिपोर्ट
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी को अपराध से जोड़ने वाला कोई फॉरेंसिक या भौतिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। मामले में न तो कोई हथियार बरामद हुआ और न ही घटनास्थल से आरोपी की कोई संदिग्ध वस्तु मिली।
यद्यपि आरोपी ने पुलिस के सामने दावा किया था कि बच्ची की मौत लकड़ी की छड़ी लगने से दुर्घटनावश हुई थी, लेकिन मेडिकल जांच में साबित हुआ कि उसकी मृत्यु गला घोंटने (स्ट्रैंगुलेशन) से हुई थी। अदालत ने माना कि आरोपी का दावा झूठा साबित होने का अर्थ यह नहीं है कि उसने ही यह अपराध किया है।
संदेह का लाभ
हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि परिस्थितियां आरोपी पर गंभीर संदेह पैदा करती हैं, लेकिन केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट) देते हुए बरी कर दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
यह पूरा मामला फरवरी 2020 का है। 26 फरवरी को बच्ची लापता हुई थी और अगली सुबह उसका शव बरामद किया गया था।

