इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक घर खरीदार महिला को 13 साल से अधिक समय तक कानूनी विवादों में उलझाए रखने और फ्लैट का कब्जा न देने पर रियल एस्टेट बिल्डर के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने बिल्डर की याचिकाओं को फिजूल करार देते हुए उस पर 2.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। जस्टिस प्रशांत कुमार की पीठ ने बिल्डर को यह राशि 4 सप्ताह के भीतर सीधे पीड़ित महिला को देने का निर्देश दिया है। 31 जुलाई को सुनाए गए इस फैसले में पीठ ने कहा कि बिल्डर ने अपनी कानूनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए लंबी मुकदमेबाजी का सहारा लिया, जिससे लगभग पूरा भुगतान कर चुकी महिला को गंभीर आर्थिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
बिना ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के कब्जा गैरकानूनी
बिल्डर ने हाईकोर्ट में तर्क दिया था कि महिला ने 8 जुलाई 2017 को अपनी अंतिम किश्त चुकाई थी और उसी दिन उसे फ्लैट का कब्जा सौंप दिया गया था। बिल्डर का दावा था कि महिला ने इस तथ्य को रेरा से छुपाया और ट्रिब्यूनल में बहाली अर्जी दाखिल करने में हुई दो साल से अधिक की देरी जानबूझकर नहीं की गई थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने बिल्डर के इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रोजेक्ट के पास ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (भोग प्रमाण पत्र) ही मौजूद नहीं था। नियम के अनुसार, ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के बिना किसी भी खरीदार को भौतिक कब्जा कानूनी रूप से नहीं सौंपा जा सकता। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने पाया कि समय सीमा समाप्त होने के बाद बहाली अर्जी दाखिल करने का बिल्डर के पास कोई वाजिब कारण नहीं था।
रेरा के आदेश को चुनौती देने की कोशिश हुई नाकाम
मामले के दस्तावेजों के अनुसार, महिला ने 2011 में जून 2013 तक कब्जा मिलने के आश्वासन पर फ्लैट बुक किया था। इसके लिए उसने 35.9 लाख रुपये जमा किए, जो कुल कीमत का लगभग पूरा हिस्सा था। इसके बावजूद बिल्डर ने न तो निर्माण कार्य पूरा किया और न ही तय समय सीमा में कब्जा सौंपा।
लंबे इंतजार के बाद महिला ने रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) का रुख किया। जुलाई 2018 में रेरा ने बिल्डर को तुरंत फ्लैट का कब्जा देने और 30 जून 2013 से देरी के लिए 24 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भुगतान करने का आदेश दिया।
इस आदेश का पालन करने के बजाय बिल्डर ने उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपील दायर की। पैरवी न करने के कारण ट्रिब्यूनल ने याचिका कई बार खारिज की और अंततः 10 जुलाई 2020 को इसे पूरी तरह निरस्त कर दिया। इसके दो साल से अधिक समय बाद बिल्डर ने मामला दोबारा शुरू करने के लिए पुनरुद्धार (रेस्टोरेशन) याचिका दायर की, जिसे ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया। इसके बाद बिल्डर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
13 साल का लंबा इंतजार और मानसिक प्रताड़ना
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला एक खरीदार द्वारा अपना घर पाने की उम्मीद में जीवन भर की पूंजी लगाने और 13 साल से अधिक समय तक इंतजार करने का एक स्पष्ट उदाहरण है। अदालत ने टिप्पणी की कि बिल्डर का आचरण रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 के मूल उद्देश्य को कमजोर करने वाला है।
पीठ ने पाया कि 2018 से पक्ष में आदेश होने के बावजूद महिला को लगातार कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। अदालत के अनुसार, बिल्डर की कानूनी कार्यवाहियों का एकमात्र उद्देश्य आदेश के पालन में देरी करना था। इसी वजह से हाईकोर्ट ने बिल्डर पर 2.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए इसे चार सप्ताह के भीतर चुकाने का निर्देश दिया।

