सुप्रीम कोर्ट ने उत्पादों की गुणवत्ता, शुद्धता और विक्रेताओं के विवरण से जुड़े उपभोक्ताओं के ‘राइट टू नो’ (जानने के अधिकार) को लेकर दायर याचिका पर बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए छह सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई तीन महीने बाद निर्धारित की है।
बुधवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने पीठ को बताया कि अब तक केवल कुछ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपना जवाब दाखिल किया है। इनमें हरियाणा, पंजाब, बिहार, असम और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। इस पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने उन सभी पक्षों को छह हफ्ते का समय दिया जिन्होंने अब तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में इस जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की थी और केंद्र सरकार, राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
दुकानों पर पंजीकरण विवरण प्रदर्शित करने की मांग
अधिवक्ता अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दाखिल की गई इस याचिका में मांग की गई है कि प्रत्येक उपभोक्ता को वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, मानक और मूल्य के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त करने का मौलिक अधिकार मिलना चाहिए।
इसके साथ ही, याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वे सभी व्यापारियों, वितरकों और दुकानदारों के लिए अपने व्यावसायिक स्थान के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक स्पष्ट बोर्ड लगाना अनिवार्य करें। इस बोर्ड पर दुकान का नाम, पता, फोन नंबर और कर्मचारियों की कुल संख्या जैसे पंजीकरण विवरण मोटे अक्षरों में दर्ज होने चाहिए।
ग्राहकों को धोखाधड़ी से बचाने के लिए उठाया कदम
याचिका में तर्क दिया गया है कि व्यापार में पारदर्शिता न होने के कारण उपभोक्ता अक्सर धोखाधड़ी और भ्रामक दावों का शिकार हो जाते हैं। कई मामलों में असंतुष्ट या ठगे गए ग्राहकों के लिए सामान बेचने के बाद गायब हो जाने वाले विक्रेताओं या वितरकों को खोजना मुश्किल हो जाता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि किसी उत्पाद या सेवा में कोई खराबी सामने आती है, तो कंज्यूमर फोरम (उपभोक्ता विवाद निवारण मंच) में शिकायत दर्ज कराने और मुआवजा पाने के लिए विक्रेता और वितरक की सही जानकारी होना बेहद आवश्यक है। ‘राइट टू नो’ लागू होने से उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार प्रथाओं से सुरक्षा मिलेगी और वे खरीदारी करते समय सही और सूचित फैसले ले सकेंगे।

