सुप्रीम कोर्ट ने टेलीविजन चैनलों की कीमतों से जुड़े भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के नियमों को चुनौती देने वाली जियोस्टार इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की ट्रांसफर याचिका का मंगलवार को निपटारा कर दिया। शीर्ष अदालत ने मीडिया कंपनी से कहा कि वह दिल्ली हाईकोर्ट जाकर यह साफ करे कि वह अपनी दशक पुरानी याचिकाओं में कोई संशोधन नहीं करना चाहती है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बेहतर होगा कि कंपनी हाईकोर्ट वापस जाए। पीठ ने सुझाव दिया कि कंपनी अंतरिम आदेश के पैराग्राफ 4 और 5 के आलोक में हाईकोर्ट के सामने एक आवेदन दायर कर यह स्पष्ट करे कि वह अपनी याचिका में बदलाव नहीं करना चाहती। जियोस्टार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट से ट्रांसफर अर्जी वापस लेने पर सहमति जताई और कहा कि कंपनी हाईकोर्ट के संबंधित जज के समक्ष अपनी बात रखेगी।
हाईकोर्ट का निर्देश और हर्जाने का विवाद
जियोस्टार ने लॉ फर्म करंजावाला एंड कंपनी के माध्यम से 2014 और 2015 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। इन याचिकाओं में ट्राई के रेगुलेटरी ढांचे, टैरिफ ऑर्डर, अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) की सीमा और केबल व डीटीएच वितरण के लिए डिस्काउंट स्ट्रक्चर को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में टेलीकॉम विवाद निपटान और अपीलीय न्यायाधिकरण (टीडीएसएटी) से जुड़े समान कानूनी मुद्दों पर विचार जारी रहने के कारण हाईकोर्ट में यह मामला लंबित रहा। हाल ही में हाईकोर्ट ने जियोस्टार को अपनी याचिकाएं संशोधित करने का निर्देश दिया था और कंपनी पर जुर्माना (कॉस्ट) भी लगाया था।
हाईकोर्ट के इस रुख का विरोध करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि जब कंपनी बार-बार यह कह रही है कि उसे संशोधन की आवश्यकता नहीं है, तो उस पर जुर्माना क्यों लगाया गया? उन्होंने कहा कि इस तरह के आदेश से यह संदेश जाता है जैसे अदालत ने पहले ही मान लिया हो कि संशोधन न करने पर याचिका खारिज कर दी जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जियोस्टार का इरादा अपने मामले को छोड़ने या बदलने का बिल्कुल नहीं है।
क्षेत्राधिकार का पेच और व्यावसायिक दरों पर आपत्ति
कानूनी बारीकियों को समझाते हुए रोहतगी ने अदालत को बताया कि ट्राई के नियम और टैरिफ आदेश एक साथ जारी होते हैं और आपस में गहराई से जुड़े हैं, लेकिन उनके अधिकार क्षेत्र के स्रोत अलग-अलग हैं। उन्होंने तर्क दिया कि नियम विधायी शक्तियों से बनते हैं और हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि प्रशासनिक टैरिफ आदेश टीडीएसएटी के दायरे में आते हैं।
इसके साथ ही जियोस्टार ने ट्राई द्वारा तय ‘ग्राहक’ (सब्सक्राइबर) की परिभाषा पर भी सवाल उठाए। रोहतगी ने कहा कि मौजूदा नियमों के तहत सैकड़ों टीवी सेट वाले उन लग्जरी होटलों को भी साधारण एक कमरे वाले मकानों के बराबर माना गया है, जो प्रति कमरा 50,000 रुपये तक वसूलते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि व्यावसायिक इस्तेमाल और सामान्य घरेलू टीवी देखने में स्पष्ट अंतर होना चाहिए और दोनों पर एक समान शुल्क लगाना सही नहीं है।
हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करेगी कंपनी
सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद जियोस्टार ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि वह अपनी बात सीधे दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष रखेगी। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि वह हाईकोर्ट में आवेदन देकर यह आधिकारिक रूप से दर्ज कराएगी कि उसकी याचिका में किसी संशोधन की जरूरत नहीं है और वह अपने मूल तर्कों के साथ कानूनी लड़ाई जारी रखेगी।

