हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बिलासपुर जिले में बिना जमीन अधिग्रहण के सड़क बनाने के 31 साल पुराने मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौखिक सहमति या देरी का हवाला देकर नागरिकों के संवैधानिक संपत्ति अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। जस्टिस रमेश वर्मा ने राज्य प्रशासन की दूसरी अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पीड़ित बंती देवी और अन्य प्रभावित भू-स्वामियों को ब्याज, सोलेशियम और 10,000 रुपये के मुकदमा खर्च के साथ पूरा मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
लिखित प्रमाण प्रस्तुत करने में असफल रहा प्रशासन
29 जुलाई को पारित अपने निर्णय में जस्टिस रमेश वर्मा ने कहा कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी नागरिक को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान जब अदालत ने पूछा कि क्या ग्रामीणों की मौखिक सहमति से जुड़ा कोई दस्तावेज मौजूद है, तो सरकारी पक्ष ऐसा कोई भी लिखित रिकॉर्ड या साक्ष्य पेश करने में नाकाम रहा। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार निजी भूमि पर अनधिकृत कब्जे को सही ठहराने के लिए समय सीमा, देरी या ‘एडवर्स पजेशन’ (प्रतिकूल कब्जे) का सहारा नहीं ले सकती।
मुआवजे में भेदभाव को बताया गैर-कानूनी
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के ही गवाह द्वारा दिए गए बयान का उल्लेख किया। सरकारी गवाह ने स्वीकार किया था कि इसी सड़क परियोजना के लिए ली गई अन्य लोगों की जमीनों का मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है। इस पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि समान स्थिति वाले भू-स्वामियों के साथ भेद-भावपूर्ण रवैया अपनाना पूरी तरह अनुचित है। जब कुछ प्रभावितों को भुगतान किया जा चुका है, तो शेष भू-स्वामियों को उनके वैध अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।
तीन दशक पुराना भूमि विवाद
यह विवाद बिलासपुर जिले में पनोल-झंडूता-नंद-नगरांव सड़क के निर्माण से जुड़ा है। राज्य सरकार का दावा था कि वर्ष 1995 में स्थानीय ग्राम पंचायत ने भू-स्वामियों की मौखिक अनुमति से सड़क का निर्माण कराया था। इसके बाद, वर्ष 2002 में हिमाचल सड़क परिवहन निगम (एचआरटीसी) की बस सेवाएं शुरू होने पर लोक निर्माण विभाग ने इस मार्ग का रखरखाव संभाल लिया था।
दूसरी ओर, प्रभावित जमीन मालिकों ने अदालत का रुख करते हुए कहा कि आसपास के भू-स्वामियों को मुआवजा मिलने के बावजूद उन्हें लगातार भुगतान से वंचित रखा गया। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उनकी जमीन, फसलों और पेड़ों को और नुकसान पहुंचाने की धमकियां भी दी थीं।
अदालती आदेश और अंतिम निर्णय
मामले की सुनवाई करते हुए झंडूता के सिविल जज ने 6 अप्रैल 2024 को इसे ‘डीम्ड एक्विजिशन’ (मानित अधिग्रहण) मानते हुए भू-स्वामियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। अदालत ने राज्य को सोलेशियम, ब्याज और 10,000 रुपये कानूनी खर्च के साथ मुआवजा देने का आदेश दिया था। बिलासपुर के जिला जज ने 3 दिसंबर 2024 को इस फैसले की पुष्टि की थी।
सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 100 के तहत मामले में कानून का कोई सारभूत प्रश्न न पाते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और सभी लंबित आवेदनों को भी निपटा दिया।

