हादसे की तारीख पर वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं तो बीमा कंपनी की देनदारी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने ‘पे एंड रिकवर’ का सिद्धांत लागू किया

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा है कि यदि दुर्घटना की तारीख पर वाहन चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था और सरकारी रिकॉर्ड के कथित नुकसान को प्राथमिक साक्ष्य से साबित नहीं किया गया है, तो बीमा कंपनी को मोटर दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के पक्ष में निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) के निष्कर्ष को बहाल किया। शीर्ष अदालत ने ‘पे एंड रिकवर’ (भुगतान करें और वसूलें) का सिद्धांत लागू करते हुए बीमा कंपनी को वाहन मालिक और चालक से मुआवजे की राशि वसूलने की छूट दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 14 अक्टूबर 2009 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जब एक अनियंत्रित वाहन ने दोपहिया वाहन चालक को टक्कर मार दी थी। दुर्घटना में लापरवाही से गाड़ी चलाने का पहलू निर्विवाद था, लेकिन विवाद दुर्घटना की तारीख पर चालक ओम प्रकाश के लाइसेंस की वैधता को लेकर खड़ा हुआ।

एमएसीटी, पानीपत ने दावेदार को 7.5% ब्याज के साथ 86,95,947 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि, न्यायाधिकरण ने केवल चालक और वाहन मालिक (राजिंदर सिंह) को जिम्मेदार ठहराया और बीमा कंपनी को इस आधार पर मुक्त कर दिया कि दुर्घटना के समय चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था।

इसके खिलाफ अपील पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष को पलट दिया, कुल मुआवजे की राशि को 8% ब्याज के साथ बढ़ाकर 1,08,08,909 रुपये कर दिया और रिलायंस जनरल इंश्योरेंस को भुगतान के लिए उत्तरदायी ठहराया। हाईकोर्ट ने मोटर लाइसेंसिंग अधिकारी द्वारा जारी एक पत्र पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि आउटसोर्स कंपनियों (एचसीएल से डीआईएमटीएस) के बीच डेटा ट्रांसफर के दौरान तकनीकी खराबी के कारण वर्ष 2007 से 2010 के बीच के लाइसेंस नवीनीकरण का रिकॉर्ड खो गया था। दायित्व तय किए जाने से व्यथित होकर बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

साक्ष्य के मानक और ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य मुद्दा यह था कि क्या दुर्घटना की तारीख पर चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस था या नहीं। साक्ष्यों की जांच करते हुए अदालत ने पाया कि आधिकारिक गवाहों की गवाही और रिकॉर्ड के अंशों से यह स्थापित होता है कि लाइसेंस 21 जून 2007 को समाप्त हो गया था और अंतरिम अवधि के लिए जुर्माना जमा करने के बाद 25 अगस्त 2010 को ही इसका नवीनीकरण कराया गया था।

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सिस्टम डेटा हानि से जुड़े द्वितीयक साक्ष्य पर हाईकोर्ट के भरोसे पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 61 से 64 के तहत आधिकारिक रिकॉर्ड को प्राथमिक साक्ष्य के माध्यम से ही साबित किया जाना चाहिए, जब तक कि धारा 65 के तहत निर्धारित शर्तें स्पष्ट रूप से न तो कही गई हों और न ही साबित की गई हों।

नीरज दत्ता बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने रेखांकित किया:

“प्राथमिक साक्ष्य सर्वोत्तम साक्ष्य है और यह प्रश्नगत तथ्य की सर्वाधिक निश्चितता प्रदान करता है। इस प्रकार, जब किसी विशिष्ट तथ्य को दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करके स्थापित किया जाना हो, तो मौखिक साक्ष्य देने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। जो प्रस्तुत किया जाना है वह प्राथमिक साक्ष्य यानी दस्तावेज स्वयं है। केवल तभी जब प्राथमिक स्रोत की अनुपस्थिति को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट कर दिया गया हो, दस्तावेजों की सामग्री को साबित करने के लिए द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति दी जाती है।”

अदालत ने थरामेल पीतांबरन बनाम टी. उशीकृष्णन मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें द्वितीयक साक्ष्य के कानूनी सिद्धांतों को संक्षेप में स्पष्ट किया गया था:

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“प्राथमिक साक्ष्य ही नियम है, जबकि द्वितीयक साक्ष्य केवल प्राथमिक साक्ष्य की अनुपस्थिति में ही स्वीकार्य एक अपवाद है।”

पीठ ने माना कि परिवहन विभाग द्वारा डेटा के वास्तविक नुकसान या उसे पुनर्प्राप्त करने के कदमों को साबित करने के लिए कोई आधिकारिक रिकॉर्ड अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में केवल मौखिक बयानों और असत्यापित पत्रों को अंतराल अवधि के दौरान वैध लाइसेंस होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

वाहन मालिक की जिम्मेदारी और पिछली तारीख से नवीनीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि देर से नवीनीकरण के लिए जुर्माना भरना ही इस बात की पुष्टि करता है कि लाइसेंस की वैधता में अंतर मौजूद था। तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड बनाम पेंजरला विजय कुमार मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

“इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यदि किसी लाइसेंस का नवीनीकरण एक अंतराल के बाद भी किया जाता है, तो वह नवीनीकरण पिछली तारीख से प्रभावी माना जाएगा, जिससे यह तात्पर्य निकले कि वह अंतरिम अवधि के दौरान भी निरंतर और वैध था…”

अदालत ने आगे कहा कि वाहन मालिक यह साबित करने के लिए गवाह के रूप में पेश नहीं हुआ कि उसने चालक के लाइसेंस की वैधता की जांच करने के लिए उचित सावधानी बरती थी। बेली राम बनाम राजिंदर कुमार (जिसमें नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम हेम राज को मंजूरी दी गई थी) के सिद्धांतों को दोहराते हुए अदालत ने कहा कि वाहन मालिकों का समाज के प्रति एक कर्तव्य है और वे लाइसेंस नवीनीकरण की जांच न करने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते।

अदालत का निर्णय और सुझाव

बीमा कंपनी की अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि रिलायंस जनरल इंश्योरेंस पर मुआवजे का अंतिम बोझ नहीं डाला जा सकता। दावेदारों के हितों की रक्षा के लिए अदालत ने ‘पे एंड रिकवर’ का सिद्धांत लागू किया। इसके तहत दावेदारों को जारी की गई राशि बरकरार रहेगी, जबकि रिलायंस जनरल इंश्योरेंस को पूरी राशि वाहन मालिक और चालक से वसूलने की स्वतंत्रता होगी।

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ऐसी लापरवाही के कारण व्यक्तियों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को ध्यान में रखते हुए अदालत ने वैध ड्राइविंग लाइसेंस बनाए रखने के महत्व पर बल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और राज्यों के संबंधित विभाग जागरूकता अभियान चलाएं, नवीनीकरण प्रक्रियाओं को सरल बनाएं, ड्राइविंग स्कूलों को विनियमित करें और क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा तथा आवेदनों की उपलब्धता सुनिश्चित करें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम ओम प्रकाश व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 6743-6744/2023 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 30 जुलाई 2026

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