विरोध प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक रास्तों पर कब्जा अस्वीकार्य हैः SC

आज Supreme Court में माननीय न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, माननीय न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और माननीय न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की एक बेंच ने ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर महत्वपूर्ण निर्णय दिया। 

यह मामला शाहीन बाग से संबंधित है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की उत्पत्ति का उल्लेख किया, जो नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 से शुरू होता है। सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं जो नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 की वैधता और संवैधानिकता से संबंधित हैं। ये सभी मामले सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है और इसमें किसी तरह का कोई स्थगन आदेश नही है।

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने तब आदेश दिनांक 17.02.2020 का उल्लेख किया, जहां यह उल्लेख किया गया था कि भले ही कानून को चुनौती दी गई हो, लेकिन लोगों कोविरोध करने का अधिकार है, परन्तु साथ ही ये भी सवाल है कि विरोध प्रदर्शन कैसे और कहां होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका (सिविल) नंबर 429/2020 का उल्लेख किया जो दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गयी थी, जहां ओखला अंडरपास सहित सार्वजनिक सड़क कालिंदी कुंज-शाहीन बाग खंड खोलने की मांग की गई थी, जिस पर सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों द्वारा कब्जा कर लिया गया था ।

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित किया गया था कि कानून और व्यवस्था को स्थिर बनाए रखने के लिए सरकार याचिकाकर्ताओं की शिकायत को देखेगी। 

हालाँकि, विरोध स्थल पर स्थिति वैसे ही बनी हुई थी, इसलिए याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कार्यवाही

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के विरोध प्रदर्शनों को हर जगह सार्वजनिक तौर पर रोकने की आवश्यकता थी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कोर्ट के द्वारा एक समाधान ढूढ़ने के लिए दो वार्ताकारों – श्री संजय आर हेगड़े और सुश्री साधना रामचंद्रन को प्रदर्शनकारियों की शिकायत सुनने के लिए विरोध स्थलों पर भेजा गया था। वार्ताकारों द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों की मांग विविध थी, और विरोध में कई हितधारक थे।

परन्तु सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त वार्ताकारों की मदद से भी कोई सौहार्दपूर्ण समाधान नहीं निकल सका।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, अगर उन्हें लगता है कि उनके अधिकारों को खतरे में डाला जा रहा था। इसके सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हमारे देश पर ब्रिटिश कब्जे के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का भी संदर्भ दिया गया था, जिसके माध्यम से हमारे देश को आजादी मिली थी। 

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि नई दिल्ली में जंतर मंतर जैसी जगहों पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पूर्व में किये गये है। 

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ साफ कहा कि सार्वजनिक रास्तों विरोध प्रदर्शन के लिए कब्जा कर लेना, कहीं से भी उचित नहीं है और ऐसे मामलों में प्रशासन को अतिक्रमण हटाने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि याचिका को निस्तारित करने के बजाय दिल्ली उच्च न्यायालय को स्थिति की निगरानी करनी चाहिए थी। यह भी कहा गया कि उत्तरदाताओं का कर्तव्य स्थिति को नियंत्रित करना और परिणाम उत्पन्न करना था, और उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने के तरीके के बारे में अदालतों की ओर नहीं देखना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट कोर्ट द्वारा आगे कहा गया कि कार्य करना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है, और उन्हें अपने प्रशासनिक कार्यों को करने के लिए अदालत के आदेशों के पीछे नहीं छिपना चाहिए और न ही समर्थन मांगना चाहिए। 

उपरोक्त टिप्पणी के आलोक में मामले की कार्यवाही माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा समाप्त कर दी गयी।

Case Details:-

Title:- Amit Sahni vs Commissioner of Police & Ors

Case No.: CIVIL APPEAL NO. 3282 OF 2020

Date of order: 07.10.2020

Coram: Hon’ble Justice Sanjay Kishan Kaul, Hon’ble Justice Aniruddha Bose and Hon’ble Justice Krishna Murar

Advocates: Counsel for the applicants Mr Mehmood Pracha; Mr Tushar Mehta for the respondents 

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