पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पैसों की वसूली से जुड़े आठ साल पुराने एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों के खिलाफ दर्ज केस रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल उधारी के पैसे वापस मांगना या लेनदेन से जुड़ा दबाव कानूनी तौर पर खुदकुशी के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता, जब तक कि इसके पीछे कोई सीधा उकसावा या जानबूझकर की गई मदद का ठोस सबूत न हो।
जालंधर में चार सदस्यों के परिवार की मौत का मामला
यह मामला 25 सितंबर 2016 का है, जब जालंधर में अनिल अग्रवाल, उनकी पत्नी और दो बच्चों ने खुदकुशी कर ली थी। घटना स्थल से मिले एक पन्ने के सुसाइड नोट में आठ लोगों पर आरोप लगाया गया था, जिसके आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत केस दर्ज किया था। नोट में आरोप था कि मूल धन और ब्याज चुकाने के बावजूद कर्जदाता परिवार को प्रताड़ित और प्रताड़ित कर रहे थे।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और एफआईआर रद्द करने का निर्णय
जस्टिस मनीषा बत्रा की पीठ ने आरोपी दंपति कुलवीर सिंह और उनकी पत्नी राजवीर कौर की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और सभी कानूनी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि सुसाइड नोट केवल पीड़ित की व्यक्तिगत पीड़ा का बयान है। इससे यह साबित नहीं होता कि आरोपियों की मंशा परिवार को आत्महत्या के लिए उकसाने की थी।
अदालत ने जोड़ा कि सामान्य प्रताड़ना या धमकियों के आरोपों से यह सिद्ध नहीं होता कि आरोपियों ने कोई ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाया जिससे पीड़ितों के पास जान देने के अलावा कोई विकल्प न बचा हो। ऐसे में आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
बचाव पक्ष और राज्य सरकार के तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बीपन घई और अधिवक्ता निखिल घई ने अदालत में कहा कि उनके मुवक्किल कोई फाइनेंस या पैसों के लेन-देन का कारोबार नहीं करते, बल्कि घर से टिफिन सर्विस चलाते हैं। उन्होंने सुसाइड नोट की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि चार मौतों के बावजूद नोट केवल एक व्यक्ति द्वारा लिखा और हस्ताक्षरित प्रतीत होता है, जिससे इसके फर्जी होने की आशंका खारिज नहीं की जा सकती।
इसके अलावा, विशेष जांच टीम (एसआईटी) की पूछताछ के दौरान शिकायतकर्ता—मृतक अनिल अग्रवाल की बहन—ने खुद कहा था कि उन्हें मौत के वास्तविक कारणों की जानकारी नहीं है और वे मामले में आगे कार्रवाई नहीं चाहती हैं।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि एफआईआर एक विस्तृत सुसाइड नोट पर आधारित थी, जिसमें सभी आठ आरोपियों के नाम और मोबाइल नंबर दर्ज थे। पुलिस पक्ष की दलील थी कि हालांकि एसआईटी ने पांच अन्य सह-आरोपियों को जांच में निर्दोष पाया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं को क्लीन चिट नहीं मिली थी। ऐसे में सुसाइड नोट की सच्चाई का परीक्षण ट्रायल के दौरान होना चाहिए।
तमाम तर्कों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जांच सामग्री और एफआईआर के आरोप, पूरी तरह स्वीकार करने पर भी, धारा 306 आईपीसी के तहत आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करते हैं।

