कर्नाटक हाईकोर्ट ने बिहार के 26 वर्षीय युवक श्याम प्रवीण सिंह के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है। उस पर फेसबुक पर बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री देखने और अपलोड करने का आरोप है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराध समाज के खिलाफ हैं और इन्हें किसी भी तरह क्षमा नहीं किया जा सकता।
जस्टिस नागप्रसन्ना ने श्याम प्रवीण सिंह की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने नवंबर 2025 में व्हाइटफील्ड पुलिस स्टेशन द्वारा दर्ज स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी।
देरी के आधार पर एफआईआर रद्द करने की दलील खारिज
याचिकाकर्ता का कहना था कि कथित घटना वर्ष 2020 की है, जबकि उसके खिलाफ शिकायत वर्ष 2025 में दर्ज की गई। इसलिए एफआईआर को रद्द किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी बच्चे से जुड़ी अश्लील सामग्री को अपलोड करना, उसे सोशल मीडिया पर उपलब्ध रखना या मोबाइल फोन में संग्रहीत करना प्रथम दृष्टया सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67बी के तहत अपराध है।
जस्टिस नागप्रसन्ना ने यह भी कहा कि यदि आरोप बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री देखने का हो, तो 10 वर्ष बाद दर्ज एफआईआर पर भी अदालत विचार करेगी। ऐसे मामलों में पांच वर्ष की देरी कोई मायने नहीं रखती।
फेसबुक अकाउंट याचिकाकर्ता के मोबाइल नंबर से जुड़ा मिला
पुलिस के अनुसार, जिस फेसबुक अकाउंट से कथित तौर पर बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री अपलोड की गई थी, वह याचिकाकर्ता के मोबाइल नंबर से जुड़ा हुआ पाया गया। यह सामग्री 29 अप्रैल 2020 को अपलोड की गई थी और बाद में भी सोशल मीडिया पर उपलब्ध रही।
इसी आधार पर व्हाइटफील्ड पुलिस ने नवंबर 2025 में श्याम प्रवीण सिंह के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज की।
प्रारंभिक चरण में जांच रोकना उचित नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की जांच आवश्यक है और शुरुआती चरण में इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री से संबंधित अपराध समाज के खिलाफ अपराध हैं और इन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। इसलिए मामले की जांच जारी रहेगी और एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज की जाती है।

