मद्रास हाईकोर्ट ने मदुरै साइबर क्राइम पुलिस को नाम तमिलर काची (एनटीके) के प्रमुख सेंथमिझान सीमन के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक और अपमानजनक पोस्ट के मामले में तेजी से जांच करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अपराधों से जुड़ी जांच में देरी होने से महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नष्ट हो सकते हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एल विक्टोरिया गौरी ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की आजादी महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत इस पर तर्कसंगत प्रतिबंध भी लागू होते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी को भी ऐसी सामग्री प्रकाशित करने की इजाजत नहीं देती जो आपराधिक श्रेणी में आती हो, भले ही मामला किसी राजनीतिक हस्ती से जुड़ा हो। इसके साथ ही अदालत ने जोर दिया कि जांच एजेंसियों को राजनीतिक पहचान के आधार पर अलग-अलग मानक नहीं अपनाने चाहिए और शिकायतों पर एक समान तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए।
डिजिटल साक्ष्य नष्ट होने का खतरा
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि साइबर अपराधों के मामलों में ढिलाई बरतने से ऑनलाइन सामग्री हटाई जा सकती है, उसमें बदलाव किया जा सकता है या डिजिटल पदचिह्न मिट सकते हैं। अदालत ने कहा कि इस चरण में पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी आरोपों के गुण-दोष तय करने के बजाय डिजिटल स्रोतों की पहचान करने, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने और निष्पक्ष जांच आगे बढ़ाने की है।
मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस का रुख
यह आदेश नाम तमिलर काची के राज्य समन्वयक और अधिवक्ता जी थिरुमुरुगन द्वारा दायर रिट याचिका पर आया। थिरुमुरुगन ने 2 जुलाई को मदुरै पुलिस आयुक्त, पुलिस अधीक्षक और साइबर क्राइम थाने में दो सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि यूट्यूब वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट में सीमन की मॉर्फ्ड तस्वीरों और तमिल में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर उन्हें निशाना बनाया गया।
राज्य सरकार के वकील ने अदालत को 28 जुलाई की सुनवाई में बताया कि पुलिस ने 25 जुलाई को मामले में शिकायत दर्ज कर ली थी। पुलिस का दावा था कि याचिकाकर्ता को पूछताछ के लिए 16 जुलाई, 20 जुलाई और 24 जुलाई को समन भेजा गया था, लेकिन असहयोग के कारण जांच में देरी हुई। हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने असहयोग के आरोपों को खारिज कर दिया। अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद माना कि पुलिस की ओर से मामले में जैसी त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए थी, वैसा नहीं हुआ।
जांच और साक्ष्य संरक्षण के निर्देश
हाईकोर्ट ने मदुरै जिला साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन के निरीक्षक को निर्देश दिया कि वे विवादित पोस्ट से जुड़े सभी सोशल मीडिया अकाउंट्स, यूट्यूब चैनलों, यूआरएल और यूज़र आईडी की पहचान करें। इसके साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000 और अन्य लागू कानूनों के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को तुरंत सुरक्षित करने का आदेश दिया गया।
अदालत ने कहा कि यदि जांच में संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो पुलिस नियमानुसार कानूनी कार्रवाई करे और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित मध्यस्थों या सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से सामग्री को हटाने या ब्लॉक करने का कदम उठाए। कोर्ट ने जांच को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए तय की।

