वकील अपने परिवार का केस लड़ सकते हैं, BCI नियम केवल रिश्तेदार जज की पीठ में पेशी से रोकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने जस्टिस राजेश एस. पाटिल की पीठ के समक्ष यह स्पष्ट किया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा बनाए गए पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के नियमों का नियम 6 किसी वकील को केवल उस अदालत या ट्रिब्यूनल में पेश होने से रोकता है जहां उसका कोई रिश्तेदार पीठ (बेंच) का हिस्सा हो। कोर्ट ने साफ किया कि यह नियम किसी वकील को अपने परिवार के सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने या उनका केस लड़ने से नहीं रोकता है। हाईकोर्ट ने यह स्पष्टीकरण बेदखली की कार्रवाई से जुड़ी एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 41 नियम 27 के तहत किरायेदार को आवासीय संपत्तियों से जुड़े अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने की अनुमति दी और लंबित अपील के शीघ्र निपटारे का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह रिट याचिका याचिकाकर्ता-किरायेदार महेशकुमार बी. पटेल द्वारा दाखिल की गई थी। याचिका में अपील संख्या 8/2014 के आवेदन प्रदर्श 40 में 19 जून, 2018 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। ट्रायल कोर्ट में मकान मालिक की आवासीय जरूरतों (बोनाफाइड रिक्वायरमेंट) के आधार पर किरायेदार के खिलाफ बेदखली की डिग्री पारित हुई थी।

मकान मालिक की जरूरत को पूरा करने के लिए उनके पास पर्याप्त वैकल्पिक संपत्तियां उपलब्ध हैं, यह साबित करने के उद्देश्य से किरायेदार ने अपीलीय अदालत के समक्ष CPC के आदेश 41 नियम 27 के तहत अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने की अनुमति मांगते हुए प्रदर्श 40 का आवेदन किया था। अपीलीय अदालत द्वारा इस आवेदन को खारिज किए जाने के बाद किरायेदार ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 49(1)(c) के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा बनाए गए पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानकों के परिशिष्ट G के खंड I (‘अदालत के प्रति कर्तव्य’) के नियम 6 के तहत एक आपत्ति उठाई गई। यह नियम कहता है:

“कोई भी वकील किसी ऐसे कोर्ट, ट्रिब्यूनल या प्राधिकरण के समक्ष पेश नहीं होगा, कार्य नहीं करेगा, बहस नहीं करेगा या वकालत नहीं करेगा, यदि उसका एकमात्र सदस्य या कोई भी सदस्य वकील का पिता, दादा, बेटा, पोता, चाचा या मामा, भाई, भतीजा या भांजा, पहला चचेरा भाई, पति, पत्नी, मां, बेटी, बहन, चाची या मामी या बुआ या मौसी, भतीजी या भांजी, ससुर, बहू या साली या ननद या भाभी हो।”

प्रतिवादी संख्या 4 की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि नियम 6 में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है जो किसी वकील को अदालत की कार्रवाई में अपने परिवार के सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने से रोकता हो। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील आर. आर. तिवारी ने तर्क दिया कि नियम 6 किसी भी वकील को अपने परिवार के किसी भी सदस्य के लिए पेश न होने के लिए बाध्य करता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

पेशेवर आचरण के नियमों के नियम 6 का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील द्वारा उठाई गई आपत्ति को खारिज कर दिया और टिप्पणी की:

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“मेरी राय में, यह नियम किसी वकील को किसी ऐसे कोर्ट, ट्रिब्यूनल या प्राधिकरण में पेश होने से रोकता है जहां उसका उल्लेखित रिश्तेदार उस कोर्ट, ट्रिब्यूनल या प्राधिकरण का हिस्सा हो।”

CPC के आदेश 41 नियम 27 के तहत अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने के संबंध में, कोर्ट ने किरायेदार द्वारा दी गई 27 संपत्तियों की सूची का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने ध्यान दिया कि क्रम संख्या 11 से 18, 26 और 27 की संपत्तियां व्यावसायिक (कमर्शियल) संपत्तियां थीं। चूंकि बेदखली का मुकदमा विशेष रूप से आवासीय परिसर की वास्तविक आवश्यकता पर आधारित था, इसलिए कोर्ट ने कहा कि इन व्यावसायिक संपत्तियों पर रेंट कोर्ट विचार नहीं करेगी।

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दोनों पक्षों की सहमति से, मकान मालिक ने आवासीय परिसरों से संबंधित दस्तावेजों को बिना किसी अधिकार और तर्कों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले अपीलीय अदालत के समक्ष अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने पर सहमति जताई। मकान मालिक ने इस बात को ध्यान में रखते हुए यह छूट दी कि किरायेदार की रिट याचिका पिछले सात वर्षों से भी अधिक समय से प्रवेश के लिए लंबित थी।

अदालत का निर्णय और निर्देश

हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत को निर्देश दिया कि वह पृष्ठ संख्या 49 और 50 पर सूचीबद्ध आवासीय संपत्तियों से संबंधित अतिरिक्त दस्तावेजों पर विचार करे, जबकि क्रम संख्या 11 से 18, 26 और 27 को इससे बाहर रखा जाए। कोर्ट ने मकान मालिक को जवाबी दस्तावेज या मौखिक साक्ष्य पेश करके नए पेश किए गए दस्तावेजों की प्रामाणिकता को चुनौती देने का अधिकार दिया, वहीं अपीलकर्ता-किरायेदार को CPC के आदेश 41 नियम 27 के प्रावधानों के अनुसार विवादित दस्तावेजों को साबित करने का निर्देश दिया।

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हाईकोर्ट ने इस साक्ष्य प्रक्रिया को 30 सितंबर, 2026 तक पूरा करने का आदेश दिया और दोनों पक्षों को अनावश्यक स्थगन (अस्थगन याचिका) न मांगने का निर्देश दिया ताकि अपीलीय बेंच निर्धारित अवधि में अपील का निपटारा कर सके। बांद्रा स्थित स्मॉल कॉज कोर्ट की अपीलीय बेंच के समक्ष लंबित अपील संख्या 8/2014 की सुनवाई में तेजी लाते हुए हाईकोर्ट ने अदालत को दिसंबर 2026 के अंत तक अपील का निपटारा करने का प्रयास करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, दोनों पक्षों को निर्देश दिया गया कि वे अंतिम सुनवाई शुरू होते ही अपनी लिखित दलीलें, उद्धृत निर्णयों की अनुक्रमणिका (इंडेक्स), संबंधित पैराग्राफ और कानूनी सिद्धांतों के साथ जमा करें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: महेशकुमार बी. पटेल बनाम श्री लक्ष्मीकांत मुरलीधर शर्मा (मृत्यु के पश्चात कानूनी वारिसों सुनील लक्ष्मीकांत शर्मा एवं अन्य के माध्यम से)
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 1382/2019
पीठ: जस्टिस राजेश एस. पाटिल
निर्णय की तिथि: 21 जुलाई, 2026

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