आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड भारतीय नागरिकता के पुख्ता सबूत नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, बैंक पासबुक और पूर्वजों के जमीन से जुड़े दस्तावेज किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का अंतिम या पुख्ता प्रमाण नहीं हैं। अदालत ने यह टिप्पणी बांग्लादेशी नागरिक होने के संदिग्ध एक व्यक्ति की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए की।

जस्टिस देबांशु बसाक और जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने माना कि इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 के तहत अपनी नागरिकता साबित करने की पूरी जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति पर होती है, जिसे इस मामले में याचिकाकर्ता और हिरासत में लिया गया व्यक्ति साबित करने में नाकाम रहे।

नागरिकता साबित करने में विफलता

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति न तो अपना जन्मस्थान और न ही जन्म तिथि से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज पेश कर सका, जिससे जन्म के आधार पर उसकी नागरिकता साबित नहीं हो सकी। इसके अलावा, अदालत ने उसके वंश और माता-पिता से संबंधित कागजातों में भी गंभीर विरोधाभास पाए।

अदालत के अनुसार, अलग-अलग दस्तावेजों में व्यक्ति के पिता का नाम अलग-अलग दर्ज था। वहीं, रिकॉर्ड में पेश किए गए दस्तावेजों से उसकी कथित मौसी के साथ रिश्ता भी साबित नहीं हो पाया। इसके अलावा, जिन रिश्तेदारों के जरिए वंशावली के आधार पर नागरिकता का दावा किया जा रहा था, उनकी खुद की भारतीय नागरिकता स्थापित नहीं थी।

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डीएनए जांच से इनकार पर अदालत का प्रतिकूल निष्कर्ष

मामले में माता-पिता से जैविक संबंध साबित करने के लिए हाईकोर्ट ने उनके शवों के दफनाए जाने के स्थान की पहचान कर डीएनए जांच कराने का सुझाव दिया था। हालांकि, याचिकाकर्ता और हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने माता-पिता के दफन स्थलों की जानकारी देने से मना कर दिया। इस पर पीठ ने व्यक्ति के माता-पिता की भारतीय नागरिकता के दावे को लेकर उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला।

इसके बाद नागरिकता के दावे में पेश किए गए नागरिक दस्तावेजों की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने कहा कि वोटर कार्ड, आधार कार्ड, आयकर विभाग द्वारा जारी पैन कार्ड या बैंक खाता होना अपने आप में राष्ट्रीयता का निर्णायक सबूत नहीं है।

2026 की मतदाता सूची समीक्षा और हिरासत का मामला

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यह मामला हिरासत में लिए गए व्यक्ति के चाचा द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसके भतीजे को 18 जून 2026 से गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है। उन्होंने बताया कि 2026 के विशेष गहन समीक्षा (SIR) अभियान के दौरान उसके नाम को विचारणाधीन चिह्नित किया गया था और बाद में मतदाता सूची से हटा दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील अभी लंबित है और कार्रवाई से पहले उसके भतीजे को सुनवाई का मौका भी नहीं दिया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि कानूनी मानकों के तहत नागरिकता साबित करने का दायित्व पूरा नहीं किया गया है, इसलिए हिरासत के आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई वजह नहीं बनती।

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