इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो बालिगों की सहमति से हुई शादी के मामले में पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी है। अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताते हुए टिप्पणी की कि पुलिस को अपराधों की तफ्तीश करनी चाहिए, न कि नागरिकों की शादियों में बिना वजह टांग अड़ाना चाहिए।
जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने 25 जुलाई को जारी आदेश में संबंधित पुलिस अधीक्षक (एसपी) और थाना प्रभारी (एसएचओ) पर संयुक्त रूप से 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया। इसके साथ ही याचिकाकर्ता महिला के पिता को भी 5,000 रुपये का जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया। यह पूरी राशि पीड़िता को दी जाएगी।
पुलिस को अपराध की जांच करनी चाहिए, शादियों की नहीं: हाईकोर्ट
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में जांच की कोई गुंजाइश नहीं थी और पुलिस तफ्तीश के नाम पर समय बर्बाद कर रही थी। पीठ के अनुसार, दो पढ़े-लिखे बालिग नागरिकों के अपनी मर्जी से विवाह करने के फैसले की पुलिस जांच कराना न केवल आपराधिक कानून का दुरुपयोग है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन भी है।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि जब दो वयस्क नागरिक अपनी मर्जी से शादी करते हैं और दोनों उच्च शिक्षित हैं, तो इसमें किसी भी तरह के प्रलोभन या बहकावे का कोई सवाल ही नहीं उठता।
पढ़े-लिखे बालिगों का फैसला, संविधान देता है अधिकार
यह मामला प्रयागराज का है, जहां करीब 27-28 वर्ष की महिला ने इस साल फरवरी में आर्य वैदिक सभा में अपनी पसंद के पुरुष से विवाह किया था। दोनों पिछले एक साल से रिश्ते में थे। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे दोनों एमएससी और बीटीसी (बेसिक ट्रेनिंग सर्टिफिकेट) की डिग्री धारक हैं। पति हाल ही में प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त हुआ है और वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने में सक्षम है।
उत्पीड़न और धमकियों के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया
महिला ने अप्रैल महीने में जब अपनी शादी की जानकारी परिजनों को दी, तो उसके पिता और भाई नाराज हो गए। महिला का आरोप है कि उसके परिवार वालों ने उसके साथ मारपीट की और दोनों को जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद पिता ने पति के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा दी।
महिला का कहना था कि उसके पिता और परिवार के अन्य सदस्य पुलिस से साठगांठ करके उन्हें अवैध रूप से गिरफ्तार कराने, अलग करने और उसे जबरन वापस घर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। अपनी जीवन और स्वतंत्रता पर खतरे को देखते हुए दंपत्ति ने हाईकोर्ट की शरण ली थी।
अदालती आदेश के बाद भी जांच जारी रखने पर नाराजगी
हाईकोर्ट ने मामले में संबंधित पुलिस अधीक्षक के उस रुख पर गहरी निराशा जताई, जिसमें 29 अप्रैल के अदालती आदेश और दंपत्ति के दर्ज बयानों के बावजूद तफ्तीश जारी रखने की जिद की जा रही थी। पीठ ने कहा कि पुलिस ने निष्पक्ष रहने के बजाय पिता का पक्ष लिया और जांच को घसीटती रही, जो कि पूरी तरह अनुचित है।

