सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ओडिशा के तालाबिरा-द्वितीय कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़े दो दशक पुराने मामले में पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत मनमोहन सिंह और अन्य के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया। अदालत ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए निचली सीबीआई अदालत द्वारा जारी समन आदेश को निरस्त कर दिया। इस फैसले के साथ ही 27 दिसंबर 2024 को देहांत हो चुके पूर्व प्रधानमंत्री इस बहुचर्चित मामले में औपचारिक रूप से दोषमुक्त हो गए हैं।
सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि विशेष सीबीआई जज के पास जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने और मामले का संज्ञान लेने का कोई वैध आधार नहीं था। पीठ ने कहा कि यद्यपि अपीलकर्ता के निधन के बाद यह याचिका निष्प्रभावी मानी जा सकती थी, लेकिन विशेष जज द्वारा संज्ञान लेने के कानूनी पहलुओं की समीक्षा के लिए सीबीआई की दोनों क्लोजर रिपोर्टों का गहन अध्ययन किया गया। जांच रिपोर्टों को स्वीकार करने के तय कानूनी मानदंडों के आधार पर अदालत ने माना कि क्लोजर रिपोर्ट को नामंजूर करना अनुचित था, इसलिए विशेष अदालत के आदेश को रद्द कर मामला समाप्त किया जाता है।
2005 के तालाबिरा-द्वितीय कोयला आवंटन का पूरा विवाद
यह पूरा मामला वर्ष 2005 में ओडिशा स्थित तालाबिरा-द्वितीय कोयला ब्लॉक निजी क्षेत्र की कंपनी मेसर्स हिंडालको इंडस्ट्रीज लिमिटेड को आवंटित किए जाने से जुड़ा है। उस समय मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ कोयला मंत्रालय का प्रभार भी संभाल रहे थे। सीबीआई ने शुरुआत में पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, हिंडालको इंडस्ट्रीज और अन्य अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।
निचली अदालत के निर्देश और समन का घटनाक्रम
मामले की जांच के दौरान विशेष अदालत के निर्देश पर सीबीआई ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उनके कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों—तत्कालीन प्रधान सचिव टी.के.ए. नायर और निजी सचिव बी.वी.आर. सुब्रमण्यम—के बयान दर्ज किए थे। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद सीबीआई ने पर्याप्त सबूत न मिलने का हवाला देते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, लेकिन विशेष सीबीआई जज भरत पराशर ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
विशेष अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए मनमोहन सिंह, कुमार मंगलम बिड़ला, पी.सी. पारख, हिंडालको इंडस्ट्रीज तथा कंपनी के अधिकारियों शुभेंदु अमिताभ और डी. भट्टाचार्य को आईपीसी की धारा 120-बी, धारा 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात) और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत आरोपी के रूप में समन जारी किया था।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और अंतिम फैसला
विशेष अदालत के इस आदेश को मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने अपनी याचिका में दलील दी थी कि एक लोक सेवक के खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए आवश्यक वैधानिक मंजूरी नहीं ली गई थी और उनके प्रशासनिक फैसलों में कोई आपराधिक मंशा शामिल नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में अंतरिम आदेश जारी कर समन पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद अब अंतिम सुनवाई में मामले की सभी कार्यवाहियों को पूर्णतः बंद कर दिया गया।

