एशिया की सबसे बड़ी गोखुर (ऑक्सबो) झील के रूप में विख्यात बिहार के बेगूसराय स्थित कांवर झील के गिरते पारिस्थितिक तंत्र पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। झील के क्षरण और सिकुड़ते जल क्षेत्र पर प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने केंद्र सरकार, बिहार प्रशासन और प्रमुख पर्यावरण नियामकों से जवाब तलब किया है।
31 अगस्त की सुनवाई से पहले जवाब दाखिल करने के निर्देश
एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफ़रोज़ अहमद की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए हैं। पीठ ने निर्देश दिया है कि प्रतिवादी अपना जवाब हलफनामे के रूप में कोलकाता स्थित पूर्वी क्षेत्रीय पीठ के समक्ष दाखिल करें। यह जवाब 31 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले जमा करना अनिवार्य होगा।
अधिकरण ने जिन प्रमुख निकायों को मामले में पक्षकार बनाया है, उनमें केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, बिहार के मुख्य सचिव, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण तथा बिहार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख शामिल हैं।
सिमटता जल क्षेत्र और जैव विविधता का नुकसान
बेगूसराय से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर में चेरिया बरियारपुर में स्थित यह झील बूढ़ी गंडक नदी के स्वाभाविक प्रवाह और घुमाव से निर्मित हुई है। वर्ष 2020 में इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व का आर्द्रभूमि स्थल मानते हुए ‘रामसर साइट’ घोषित किया गया था। ऐतिहासिक रूप से लगभग 63 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह झील गिरते जलस्तर और अनियंत्रित अतिक्रमण के कारण अब छोटे-छोटे अलग-थलग जलनिकायों में विभाजित हो गई है।
अधिकरण ने टिप्पणी की कि जल विस्तार घटने से झील में मछलियों की आबादी और समग्र जैव विविधता में भारी गिरावट आई है, जिससे इस पर निर्भर स्थानीय मछुआरा समुदाय की आजीविका प्रभावित हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, कई स्थानीय मछली प्रजातियाँ झील के कई हिस्सों से या तो लुप्त हो चुकी हैं या उनकी संख्या नाममात्र रह गई है।
पुनरुद्धार और कानूनी प्रावधानों के तहत कदम
पीठ के अनुसार, यह मामला पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम के तहत पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
झील के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए पीठ ने कई आवश्यक उपायों को रेखांकित किया। इनमें झील को पुनः बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ना, झील के समूचे क्षेत्र का आधिकारिक सीमांकन व मैपिंग करना, अवैध अतिक्रमण को हटाना, चेक डैम या तटबंधों का समाधान निकालना तथा मानसून रीचार्ज और भूजल रिसाव के माध्यम से जल आपूर्ति सुनिश्चित करना शामिल है।

