अमेरिका में एक सड़क हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिजनों को बीमा राशि देने से इंकार करने पर दिल्ली के एक उपभोक्ता आयोग ने केयर हेल्थ इंश्योरेंस को सख्त फटकार लगाई है। आयोग ने कंपनी को मृतक के पिता को लगभग 40.76 लाख रुपये की राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि बार-बार वही दस्तावेज मांगने और फिर दावा खारिज करने का बीमा कंपनी का फैसला पूरी तरह से गैर-कानूनी था।
पश्चिम दिल्ली जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-III ने 6 जुलाई को सुनाए अपने फैसले में बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह पॉलिसी के तहत मिलने वाली राशि पर शिकायत दर्ज करने की तिथि से लेकर पूरे भुगतान तक 7 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी दे। इसके अलावा, उपभोक्ता को मानसिक उत्पीड़न, समय की बर्बादी और कानूनी खर्च के मुआवजे के रूप में 50 हजार रुपये अलग से देने का आदेश दिया गया है। कंपनी को यह पूरा भुगतान 30 दिनों के भीतर करने का समय मिला है।
दस्तावेज जमा होने के बाद भी खारिज किया गया क्लेम
यह मामला देव सिंह नाम के व्यक्ति की मौत से जुड़ा है, जिनकी 4 नवंबर 2021 को अमेरिका के लॉस एंजिल्स में एक सड़क दुर्घटना में जान चली गई थी। देव ने 30 अगस्त 2021 को केयर हेल्थ इंश्योरेंस से 9,633 रुपये का प्रीमियम देकर ‘एक्सप्लोर गोल्ड-डब्ल्यूडब्ल्यू’ नाम से एक ट्रैवल इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदी थी। यह पॉलिसी 25 फरवरी 2022 तक वैध थी और इसके तहत दुर्घटना में मृत्यु होने पर 50 हजार अमेरिकी डॉलर के बीमा कवर का प्रावधान था।
हादसे के बाद मृतक के पिता और पॉलिसी के नामांकित व्यक्ति राजीव सिंह ने बीमा कंपनी को घटना की जानकारी दी और क्लेम की प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अस्पताल के कागजात सहित कंपनी द्वारा मांगे गए सभी जरूरी दस्तावेज जमा करा दिए थे।
उपभोक्ता की ओर से दर्ज शिकायत के मुताबिक, फरवरी 2022 में ही अस्पताल से जुड़े दस्तावेज पीडीएफ फॉर्मेट में कंपनी को भेजे जा चुके थे। इसके बावजूद कंपनी बार-बार वही दस्तावेज मांगती रही और आखिरकार 16 जून 2022 को यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि मांगी गई जानकारियां नहीं दी गईं। कानूनी नोटिस भेजने के बाद भी जब बात नहीं बनी, तो राजीव सिंह ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
आयोग ने खारिज की बीमा कंपनी की दलील
आयोग के समक्ष केयर हेल्थ इंश्योरेंस ने अपना बचाव करते हुए तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने क्लेम प्रोसेस करने के लिए जरूरी पूरे दस्तावेज जमा नहीं किए थे। कंपनी का कहना था कि कई बार रिमाइंडर भेजने के बावजूद जरूरतें पूरी नहीं की गईं, जिसके चलते नियमानुसार क्लेम को बंद किया गया।
हालांकि, अध्यक्ष सोनिका मेहरात्रों, सदस्य रिचा जिंदल और अनिल कुमार कौशल की पीठ ने बीमा कंपनी के तर्कों को पूरी तरह से नकार दिया। आयोग ने रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों को देखने के बाद स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता ने कंपनी के हर सवाल का जवाब दिया था। आयोग ने टिप्पणी की कि जब सारे दस्तावेज पहले ही दिए जा चुके थे, तब भी बीमा कंपनी झूठे और बेबुनियाद कारणों से सवाल उठाती रही। आयोग ने क्लेम निरस्त करने के फैसले को अनुचित बताते हुए पीड़ित परिवार को बीमा राशि पाने का हकदार माना।

