सीपीआर के दौरान टेस्ट रिपोर्ट मांगना बेतुका: उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी पर लगाया 14.6 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना

उत्तरी दिल्ली जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-I ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में मणिपाल सिग्ना हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी के रवैये को पूरी तरह मनमाना और अनुचित करार दिया है। आयोग ने कहा कि जीवन रक्षक आपातकालीन इलाज (सीपीआर) के दौरान ऐसी जांच रिपोर्ट मांगना जो उस स्थिति में संभव ही नहीं हैं, पूरी तरह गलत है। आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित परिवार को ब्याज सहित नीतिगत लाभ और मुआवजे के रूप में 14.6 लाख रुपये से अधिक की राशि का भुगतान करे।

यह आदेश कनक लता और उनके दो नाबालिग बेटों द्वारा दायर की गई शिकायत पर आया है। कनक लता के पति पंकज श्रीवास्तव की अप्रैल 2021 में अचानक दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद बीमा कंपनी ने उनके क्लेम को तकनीकी आधारों पर खारिज कर दिया था।

इलाज के दौरान मौत और क्लेम का तकनीकी विरोध

पंकज श्रीवास्तव ने जून 2019 में इंडियाबुल्स रूरल फाइनेंस से 10.57 लाख रुपये का होम लोन लिया था। इस लोन के साथ ही मणिपाल सिग्ना की एक ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी भी जारी की गई थी, जिसके लिए 64,448 रुपये का प्रीमियम लोन राशि में ही जोड़ा गया था। इस पॉलिसी के तहत गंभीर बीमारी या मृत्यु के लिए 7 लाख रुपये, बच्चों की शिक्षा के लिए 5 लाख रुपये और अंतिम संस्कार के लिए 10,000 रुपये का कवर शामिल था।

कोविड महामारी के दौरान, अप्रैल 2021 की शुरुआत में श्रीवास्तव बीमार पड़े। 4 अप्रैल को सांस लेने में गंभीर तकलीफ होने पर उन्हें अरुणा आसिफ अली सरकारी अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में ले जाया गया। अस्पताल के रिकॉर्ड के मुताबिक, जब उन्हें कैजुअल्टी विभाग में लाया गया, तब उनका ऑक्सीजन स्तर बेहद कम था और पल्स व ब्लड प्रेशर रिकॉर्ड नहीं हो पा रहे थे। डॉक्टरों ने तुरंत उन्हें बचाने के लिए सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) और अन्य आपातकालीन उपाय शुरू किए। हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और रात 11:15 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मौत का मुख्य कारण ‘सडन कार्डियक अरेस्ट’ (अचानक दिल का दौरा पड़ना) दर्ज किया गया था।

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इस हादसे के बाद जब उनकी पत्नी कनक लता ने बीमा क्लेम पेश किया, तो मणिपाल सिग्ना ने 18 नवंबर 2021 को इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ‘सडन कार्डियक अरेस्ट’ गंभीर बीमारियों की सूची में शामिल नहीं है। कंपनी का कहना था कि परिवार ने यह साबित करने के लिए ईसीजी, कार्डियक एंजाइम या ट्रोपोनिन टेस्ट जैसी कोई रिपोर्ट पेश नहीं की जिससे यह साबित हो सके कि उन्हें ‘मायोकार्डियल इन्फार्क्शन’ (हार्ट अटैक) हुआ था, जो कि पॉलिसी के तहत कवर था। इसके साथ ही पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट न होने को भी आधार बनाया गया।

बीमा कंपनी के तर्कों पर आयोग की फटकार

आयोग के अध्यक्ष दिव्य ज्योति जयपुरियार और सदस्य अश्वनी कुमार मेहता व हरप्रीत कौर चर्या की पीठ ने बीमा कंपनी के इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने कड़े शब्दों में कहा कि एक मरीज जो अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहा हो और जिसका सीपीआर चल रहा हो, उससे ईसीजी या ट्रोपोनिन टेस्ट जैसी जांचों की रिपोर्ट मांगना न केवल चिकित्सीय रूप से हास्यास्पद है बल्कि मानवीय रूप से भी असंभव है। इसके लिए एक स्थिर समय की आवश्यकता होती है जो आपातकालीन स्थिति में उपलब्ध नहीं होता।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य या प्राकृतिक मौत के हर मामले में पोस्टमॉर्टम कराना कानूनन अनिवार्य नहीं है, इसलिए इसके अभाव में किसी वास्तविक क्लेम को खारिज नहीं किया जा सकता। पीठ ने रेखांकित किया कि बीमा कंपनी ने यह साबित करने के लिए कोई विशेषज्ञ चिकित्सा राय भी पेश नहीं की कि इस मामले में ‘सडन कार्डियक अरेस्ट’ और ‘मायोकार्डियल इन्फार्क्शन’ में कोई अंतर था। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए आयोग ने साफ किया कि बीमा कंपनियां अत्यधिक तकनीकी और जटिल नियमों का सहारा लेकर वैध दावों को खारिज नहीं कर सकतीं।

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असंवेदनशील भाषा के लिए पांच लाख का अतिरिक्त जुर्माना

आयोग ने बीमा कंपनी द्वारा क्लेम खारिज करने वाले पत्र में इस्तेमाल की गई भाषा पर भी कड़ी आपत्ति जताई। पत्र में पंकज श्रीवास्तव के बारे में लिखा गया था कि उन्हें ‘मौत की आदत थी’ (accustomed to death)। आयोग ने इस वाक्य को व्याकरणिक रूप से बेहद खराब, पूरी तरह से तर्कहीन और एक शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदनहीनता की पराकाष्ठा करार दिया। बीमा कंपनी के इस बर्ताव के लिए आयोग ने उस पर 5 लाख रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया और इस राशि को 45 दिनों के भीतर उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा करने का आदेश दिया।

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पीड़ित परिवार को राहत और वित्तीय आदेश

आयोग ने मणिपाल सिग्ना को आदेश दिया कि वह कनक लता को कुल 12.10 lakh रुपये के नीतिगत लाभ (7 लाख रुपये गंभीर बीमारी/मृत्यु कवर, 5 लाख रुपये शिक्षा निधि और 10,000 रुपये अंतिम संस्कार खर्च) का भुगतान करे। यह भुगतान 18 नवंबर 2021 से 9 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज के साथ किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, कंपनी को मानसिक प्रताड़ना के मुआवजे के रूप में 1 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 25,000 रुपये देने होंगे।

इसके साथ ही, आयोग ने कर्जदाता कंपनी इंडियाबुल्स रूरल फाइनेंस को भी दोषी पाया। जब बीमा क्लेम का मामला लंबित था, तब कंपनी ने पीड़ित परिवार के खिलाफ कर्ज वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी थी, जिसे आयोग ने अनुचित व्यापार व्यवहार माना। इसके लिए इंडियाबुल्स रूरल फाइनेंस पर 1 लाख रुपये का मुआवजा और 25,000 रुपये मुकदमा खर्च लगाया गया है। आयोग ने निर्देश दिया है कि बीमा कंपनी से मिलने वाले क्लेम की राशि को सबसे पहले होम लोन के बकाए को चुकाने में इस्तेमाल किया जाए और उसके बाद बची हुई रकम शिकायतकर्ता परिवार को सौंपी जाए।

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