आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी विभागों की देरी के कारण कर्मचारी को नहीं किया जा सकता पुरानी पेंशन से वंचित

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक सुस्ती को लेकर एक बड़ा निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकारी विभागों की अत्यधिक लेटलतीफी का खामियाजा किसी कर्मचारी को नहीं भुगतना चाहिए। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्त किए गए एक व्यक्ति को, सरकारी सुस्ती के कारण नियुक्ति में 16 साल की देरी होने के बावजूद, पुरानी पेंशन योजना समेत तमाम सेवा-संबंधी लाभ दिए जाएं।

पेंशन नियम और अदालती निर्देश

जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव ने 15 जुलाई को याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता को दिसंबर 2020 में आधिकारिक रूप से सेवा में शामिल किया गया था, लेकिन हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सेवा-संबंधी लाभों और पुरानी पेंशन की पात्रता के लिए उसे साल 2004 से ही नियुक्त माना जाए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को 2004 से 2020 के बीच की अवधि का कोई पिछला वेतन (बैक वेज) नहीं मिलेगा, क्योंकि इस दौरान उन्होंने वास्तव में कार्य नहीं किया था।

सुनवाई के दौरान आंध्र प्रदेश संशोधित पेंशन नियम, 1980 के नियम 13 का मुद्दा भी उठा, जिसके अनुसार पेंशन के लिए अर्हता सेवा वास्तविक रूप से कार्यभार संभालने की तारीख से शुरू होती है। इस नियम के चलते याचिकाकर्ता सीधे तौर पर 2004 से ही वास्तविक पूर्वव्यापी नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता था। इस कानूनी पेच को सुलझाने और अनुकंपा नियुक्ति के मूल उद्देश्य को बनाए रखने के लिए, जस्टिस राव ने अधिकारियों को सहानुभूतिपूर्वक और उदार रवैया अपनाने को कहा। उन्होंने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति को साल 2009 से पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू माना जाए, जब सरकार ने अपनी नीति में बदलाव किया था, ताकि याचिकाकर्ता पुरानी पेंशन योजना के तहत लाभ पाने का हकदार बन सके।

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद

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इस मामले की शुरुआत याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु के बाद हुई थी, जो एक सहायता प्राप्त (एडेड) कॉलेज में स्वीकृत पद पर लैब असिस्टेंट के रूप में कार्यरत थे। 8 जुलाई 2004 को ड्यूटी के दौरान उनका निधन हो गया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 12 अगस्त 2004 को अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया था।

कॉलेज प्रबंधन ने इस नियुक्ति का प्रस्ताव तैयार किया और स्थानीय शिक्षा अधिकारियों की सिफारिशों के साथ इसे मंजूरी के लिए सरकार को भेजा। हालांकि, सरकार ने 18 अक्टूबर 2006 को एक मेमो जारी कर इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। सरकार की ओर से दलील दी गई कि साल 2004 में अनुकंपा नियुक्तियों पर प्रतिबंध लगा था। साथ ही, 1 फरवरी 1994 के सरकारी आदेश का हवाला दिया गया, जिसके तहत अनुकंपा नियुक्तियां केवल सरकारी कार्यालयों में ही दी जा सकती थीं, सहायता प्राप्त संस्थानों में नहीं।

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नीतिगत बदलाव और 16 साल की लंबी प्रतीक्षा

इसके बाद सरकार ने 6 अक्टूबर 2009 को एक नया आदेश जारी कर अपनी पुरानी नीति को बदला और सहायता प्राप्त स्कूलों के मृत कर्मचारियों के योग्य बच्चों को भी अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्णय लिया। इस नीतिगत बदलाव के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर फाइलें दबी रहीं और याचिकाकर्ता को आखिरकार 3 दिसंबर 2020 को ही नियुक्ति पत्र मिल सका।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए दलील दी कि यदि संबंधित विभाग समय पर कार्रवाई करते, तो वे नई अंशदायी पेंशन योजना (कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम) के बजाय पुरानी पेंशन योजना के दायरे में आते। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलील को सही माना और कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण किसी नागरिक को उसके वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने अंततः याचिकाकर्ता को 2004 से काल्पनिक (नोशनल) नियुक्ति देने और पुरानी पेंशन योजना के तहत लाभ सुनिश्चित करने का आदेश दिया।

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