केरल हाईकोर्ट ने हिरासत का आदेश रद्द कर बंदी को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया, आवेदन पर फैसले में चार महीने की देरी को बताया अधिकारों का हनन

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) के आदेश को रद्द करते हुए एक बंदी को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने यह कदम बंदी की याचिका पर निर्णय लेने में सरकारी अधिकारियों द्वारा की गई चार महीने से अधिक की देरी के बाद उठाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक सुस्ती के कारण किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।

चीफ जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस स्याम कुमार वी एम की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर आपराधिक आरोप होने मात्र से उसके संवैधानिक अधिकार कम या खत्म नहीं हो जाते। हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन को आदेश दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

यह मामला प्रिवेंशन ऑफ इलिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस (पिट एनडीपीएस) कानून के तहत हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति से जुड़ा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत, नजरबंद किए गए व्यक्ति को अपनी हिरासत के खिलाफ अपनी बात रखने (प्रतिवेदन देने) का पूरा अधिकार है। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि सरकार को याचिकाकर्ता के इस प्रतिवेदन पर फैसला लेने में चार महीने से अधिक का समय लग गया।

प्रशासनिक तालमेल बेहतर करने की जरूरत

हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से एक सक्रिय और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था बनाने का आग्रह किया है, ताकि हिरासत के खिलाफ मिलने वाले आवेदनों का तेजी से निपटारा हो सके। खंडपीठ ने कहा कि प्रशासनिक विभागों को आपस में इस तरह समन्वय करना चाहिए कि पिट एनडीपीएस कानून के तहत मिलने वाली सरकारी रिपोर्ट और बंदी द्वारा दिए गए आवेदनों का तुरंत मिलान हो सके और उन पर बिना किसी देरी के जल्द से जल्द फैसला लिया जा सके।

संवैधानिक सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील की इस दलील को सही माना कि इतनी लंबी देरी और बेहद संवेदनहीन व अतार्किक तरीके से आवेदन को खारिज करना बंदी के संवैधानिक अधिकारों को पूरी तरह से नकारने जैसा है।

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अदालत ने जोर देकर कहा कि केंद्र या राज्य सरकारों के विभागों के बीच आपसी तालमेल की कमी या किसी भी तरह की प्रशासनिक कमजोरी को आधार बनाकर किसी नागरिक को अवैध या लंबी हिरासत में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने दृढ़ता से कहा कि संवैधानिक नियमों का हर हाल में पूरी ईमानदारी से पालन होना चाहिए और इन्हें किसी भी स्थिति में नजरअंदाज या निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।

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