राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए तालाबों से खुदाई के सरकारी आदेश रद्द, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- प्राकृतिक संसाधन सार्वजनिक धरोहर हैं

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने विजयनगरम जिला कलेक्टर के साल 2022 के उन विवादित आदेशों को खारिज कर दिया है, जिनके तहत एक राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के निर्माण के लिए निजी ठेकेदारों को स्थानीय तालाबों से रेत और मिट्टी खोदने की मंजूरी दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जल स्रोत बेहद महत्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्तियां हैं और सरकार इनकी मालिक नहीं बल्कि केवल एक ट्रस्टी (संरक्षक) है।

जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम ने 15 जुलाई को विजयनगरम जिले के कोथापलेम गांव के चार स्थानीय किसानों की रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। अदालत ने जिला कलेक्टर द्वारा जारी निर्देशों को मनमाना, अवैध और स्थापित खनन कानूनों के खिलाफ घोषित किया। कोर्ट ने साफ किया कि जनहित के बुनियादी ढांचा विकास के नाम पर भी सरकार वैधानिक सुरक्षा उपायों की अनदेखी नहीं कर सकती।

कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर जारी किए गए थे आदेश

यह पूरा विवाद विजयनगरम जिले से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-130सीडी) आर्थिक गलियारा परियोजना के निर्माण से जुड़ा है। परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने जमीन का अधिग्रहण किया था और ठेकेदारों को निर्माण सामग्री की जरूरत थी, जिसके लिए उन्होंने पास के तालाबों से रेत और मिट्टी निकालने की मंजूरी मांगी थी।

नियमों के मुताबिक, ठेकेदारों को ‘खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957’ (MMDR एक्ट) और ‘आंध्र प्रदेश लघु खनिज रियायत नियमावली, 1966’ के तहत जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर मंजूरी लेनी चाहिए थी। लेकिन जिला कलेक्टर ने 8 अप्रैल और 15 अप्रैल 2022 को सीधे आदेश जारी कर दिए। इन आदेशों में खनन और भूविज्ञान विभाग के साथ-साथ सिंचाई विभाग को निर्देश दिया गया कि वे राजस्व मंडल अधिकारी (रेवेन्यू डिविजनल ऑफिसर) द्वारा चिह्नित तालाबों से खुदाई का काम तेज कराएं।

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स्थानीय किसानों ने कन्नमनाइदु तालाब में शुरू की गई इस खुदाई का कड़ा विरोध किया। यह तालाब करीब 2,000 एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई का मुख्य आधार है और आसपास के गांवों के लिए पीने के पानी का एकमात्र जरिया है। किसानों ने दलील दी कि कानूनी प्रक्रियाओं को बायपास करने से इलाके का भूजल स्तर, जैव विविधता और कृषि संकट में पड़ रहे हैं।

धार्मिक आस्था और पर्यावरण का गहरा संबंध

जस्टिस कुंचेम ने अपने फैसले में पर्यावरण संरक्षण को संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ धार्मिक मान्यताओं से भी जोड़ा। उन्होंने टिप्पणी की कि दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों में जल को एक पवित्र और जीवनदायी संसाधन के रूप में पूजा गया है, जो ‘पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत’ के मूल विचार को दर्शाता है।

अदालत ने रेखांकित किया कि हिंदू धर्म में गंगा, यमुना और गोदावरी जैसी नदियों को देवी और माता का स्थान दिया गया है। शास्त्रों में माना गया है कि प्राकृतिक संसाधन प्रकृति के उपहार हैं जो सभी जीवों के कल्याण के लिए हैं और इनका निजीकरण या दोहन नहीं किया जा सकता। इसी तरह, इस्लाम में पानी को एक ईश्वरीय उपहार और जीवन का आधार माना गया है, जिसे प्रदूषित करने या बर्बाद करने की सख्त मनाही है और इस पर सभी का समान अधिकार है। ईसाई धर्म में भी पानी को पवित्रता और नए जीवन का प्रतीक माना गया है, जैसा कि बैपटिज्म (दीक्षा स्नान) के संस्कार में स्पष्ट होता है। बाइबल सिखाती है कि यह धरती ईश्वर की है और इंसान इन संसाधनों के रखवाले मात्र हैं।

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पब्लिक ट्रस्ट का सिद्धांत और संवैधानिक कर्तव्य

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये सभी धार्मिक मान्यताएं कानून के ‘पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत’ (सार्वजनिक न्यास का सिद्धांत) से मेल खाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के ‘एम सी मेहता बनाम कमल नाथ’ जैसे ऐतिहासिक मुकदमों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि राज्य सरकारें नदियों, झीलों, जंगलों और हवा जैसे प्राकृतिक संसाधनों की मालिक नहीं बल्कि केवल कस्टोडियन (संरक्षक) हैं।

फैसले में कहा गया कि पर्यावरण की रक्षा करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीने के अधिकार’ का एक अभिन्न अंग है। इसे अनुच्छेद 48ए और 51ए(जी) के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए, जो राज्य और देश के नागरिकों दोनों पर जंगलों, नदियों, झीलों और वन्यजीवों की रक्षा करने का संवैधानिक कर्तव्य डालते हैं।

जल संरक्षण की ऐतिहासिक विरासत

प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के महत्व पर जोर देने के लिए हाईकोर्ट ने भारत के प्राचीन राजवंशों का उदाहरण दिया। अदालत ने कहा कि मौर्य, गुप्त, चोल और विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने जल संरक्षण को सुशासन का एक अनिवार्य हिस्सा माना था।

जस्टिस कुंचेम ने विशेष रूप से श्री कृष्णदेवराय के शासनकाल में निर्मित ‘कंबम चेरुवू’ (Cumbum Cheruvu) तालाब का उल्लेख किया, जो भारत के सबसे बड़े मानव निर्मित सिंचाई तालाबों में से एक है और आज सदियों बाद भी लोगों की सेवा कर रहा है। इसके अलावा सूखाग्रस्त रायलसीमा क्षेत्र के ‘अनंतराज सागर’ (पोरुमामिला चेरुवू) और ‘बुक्करायसमुद्रम चेरुवू’ जैसे जलाशयों का भी उदाहरण दिया गया। अदालत ने कहा कि अगर हमारे पूर्वजों ने इन जल निकायों को सुरक्षित रखने के बजाय केवल तात्कालिक लाभ के लिए इनका दोहन किया होता, तो आज की पीढ़ी इन अमूल्य प्राकृतिक संपत्तियों से वंचित रह जाती।

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पूरे राज्य के लिए नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू

इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य भर में तालाबों, झीलों और नदियों से अवैध खुदाई के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने इस साल 1 अप्रैल को आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिव को पूरे राज्य के लिए एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार करने का निर्देश दिया था।

इसके जवाब में राज्य प्रशासन ने 8 मई को एक व्यापक ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (SOP) जारी की। इस नए सिस्टम के तहत अब अवैध उत्खनन को रोकने के लिए सैटेलाइट ट्रैकिंग, ड्रोन से निगरानी, सीसीटीवी कैमरे लगाने और नियमित भौतिक निरीक्षण का नियम बनाया गया है। साथ ही मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हर साल इसकी प्रगति की समीक्षा की जाएगी। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इस नई सुरक्षा प्रणाली को आंध्र प्रदेश में सख्ती से लागू करने का आदेश दिया है।

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