साइबर धोखाधड़ी की जांच में देरी पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट सख्त, तीन राज्यों के डीजीपी और केंद्रीय एजेंसियों को नोटिस

जबलपुर की एक महिला के साथ हुई साइबर ठगी के मामले की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने देश में साइबर अपराधों की जांच में होने वाली देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने देश भर में साइबर अपराधों से निपटने के लिए एक वास्तविक समय (रियल-टाइम) की मजबूत जांच प्रणाली विकसित करने के उद्देश्य से केंद्रीय गृह मंत्रालय, दूरसंचार विभाग, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) सहित असम, पश्चिम बंगाल और झारखंड के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को इस मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।

जस्टिस हिमांशु जोशी ने 14 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान असम, पश्चिम बंगाल और झारखंड के डीजीपी को 21 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है। इसके साथ ही उन्हें अपने-अपने राज्यों के पुलिस विभागों द्वारा अब तक की गई कार्रवाई की पूरी स्टेटस रिपोर्ट भी सौंपनी होगी।

मुख्य संदिग्ध असम में ट्रेस, जांच का दायरा बढ़ा

यह पूरा मामला याचिकाकर्ता चैताली मित्रा के साथ हुई ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान जबलपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी), गोराबाजार थाने के प्रभारी और मामले के जांच अधिकारी खुद कोर्ट में पेश हुए। पुलिस ने कोर्ट को बताया कि मामले की तफ्तीश के दौरान मुख्य संदिग्ध का लोकेशन असम में मिला है।

अदालत ने पाया कि इस याचिका में उठाए गए मुद्दे केवल एक व्यक्तिगत मामले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सीधा संबंध पूरे देश के साइबर सुरक्षा ढांचे और जांच प्रणाली से है। इसी वजह से कोर्ट ने असम के डीजीपी को इस मामले में प्रतिवादी बनाने की याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार कर लिया और अन्य पड़ोसी राज्यों के पुलिस प्रमुखों को भी नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।

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जांच में देरी के मुख्य कारण

जबलपुर पुलिस ने कोर्ट को बताया कि शिकायत मिलने के बाद इसे तुरंत साइबर सेल को भेज दिया जाता है, लेकिन शुरुआती स्तर पर ही जांच अधिकारियों को गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी चुनौती बैंकों से प्राथमिक जानकारी जुटाने में आती है, जिसमें तीन से पांच दिन लग जाते हैं क्योंकि लगभग सभी बैंकों के नोडल कार्यालय अलग-अलग शहरों में स्थित हैं।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, अंतर-राज्यीय समन्वय की कमी भी एक बड़ी बाधा है। जब धोखाधड़ी के तार दूसरे राज्यों से जुड़े होते हैं, तो वहां की स्थानीय पुलिस से हमेशा समय पर और त्वरित सहयोग नहीं मिल पाता, जिससे अपराधी बच निकलते हैं।

म्यूल बैंक खातों और टेलीग्राम का इस्तेमाल

जांच अधिकारियों ने कोर्ट के सामने खुलासा किया कि आजकल साइबर अपराधी बहुत ही शातिर तरीके से तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे निर्दोष लोगों के नाम पर खोले गए ‘म्यूल’ या ‘नल’ बैंक खातों का उपयोग करके पैसों का ट्रांसफर करते हैं। साथ ही, वे अपनी गतिविधियों को अंजाम देने और आपस में बातचीत के लिए टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का सहारा लेते हैं।

अधिकारियों ने बताया कि इन सोशल मीडिया और मध्यस्थ प्लेटफॉर्म से आईपी लॉग, सब्सक्राइबर की जानकारी और तकनीकी डेटा हासिल करने में काफी समय लग जाता है। इस प्रक्रिया में होने वाली देरी का फायदा उठाकर अपराधी आसानी से अपनी लोकेशन बदल लेते हैं, डिजिटल सबूतों को मिटा देते हैं और बैंक खातों से पैसे निकालकर गायब कर देते हैं।

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कागजी देरी से अपराधियों को फायदा

जस्टिस हिमांशु जोशी ने टिप्पणी की कि पारंपरिक अपराधों की तुलना में साइबर अपराधों की जांच पूरी तरह से अलग होती है और इसमें हर एक सेकंड बहुत महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि एक प्रभावी जांच के लिए पीड़ित द्वारा तुरंत रिपोर्ट करना, बैंकों द्वारा संदिग्ध खातों को फौरन फ्रीज करना, वित्तीय संस्थानों और दूरसंचार प्रदाताओं द्वारा त्वरित डेटा साझा करना और विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच बेहतरीन तालमेल होना बेहद जरूरी है।

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हाईकोर्ट ने आगाह किया कि फाइलों के ट्रांसफर और कागजी कार्रवाई में लगने वाले समय का सीधा फायदा अपराधियों को मिलता है। जब तक सूचनाओं के संकलन, तकनीकी विश्लेषण और जमीनी स्तर पर होने वाली कार्रवाई को एक एकीकृत और समन्वित ढांचे के तहत नहीं लाया जाएगा, तब तक अपराधियों को पकड़ना और ठगे गए पैसों को बरामद करना संभव नहीं होगा।

इस मामले की अगली सुनवाई अब 21 जुलाई को होगी, जहां केंद्र सरकार, आरबीआई और संबंधित राज्यों के पुलिस प्रमुख एक तेज और अधिक प्रभावी जांच प्रणाली स्थापित करने में कोर्ट की मदद करेंगे।

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