इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक प्रैक्टिसिंग वकील की ‘बी-क्लास’ हिस्ट्रीशीट को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य के पुराने पुलिस नियमों में तत्काल सुधार करने की सिफारिश की है। अदालत ने कहा कि 19वीं सदी के निगरानी तरीके और नियम आधुनिक युग के अपराधों और साइबर अपराधियों से निपटने में पूरी तरह अप्रभावी साबित हो रहे हैं।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने 19 अगस्त को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रयागराज पुलिस ने वकील के खिलाफ हिस्ट्रीशीट खोलते समय अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया और वरिष्ठ अधिकारियों ने बिना सोचे-समझे केवल यांत्रिक तरीके से इस पर अपनी मुहर लगा दी।
पुलिस नियमों में सुधार की जरूरत
अदालत ने कहा कि जिस समय यूपी पुलिस रेगुलेशन तैयार किए गए थे, उस समय समाज मवेशियों को जहर देने जैसे अपराधों से परेशान था। लेकिन आज के दौर में शातिर अपराधी माउस के एक क्लिक से बैंक खातों से लाखों-करोड़ों रुपये उड़ा लेते हैं। ऐसे में साइबर अपराधियों पर 24 घंटे नजर रखने के लिए आधुनिक तकनीक जैसे सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल जरूरी है, जबकि भौतिक निगरानी और घेराबंदी जैसे 19वीं सदी के तरीके अब बेमानी हो चुके हैं। इसीलिए राज्य सरकार को हिस्ट्रीशीट से जुड़े पुलिस नियमों को अद्यतन, संशोधित और सुधारा जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस कार्रवाई पर टिप्पणी
यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के एक सक्रिय सदस्य और पदाधिकारी की याचिका पर आया। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके भाई के हत्यारों के खिलाफ चल रहे मुकदमे की पैरवी से हटाने के लिए उस पर दबाव बनाया गया था और इसी साजिश के तहत उस पर कई झूठे आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह इन सभी मामलों में बरी हो चुका है। दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज छह आपराधिक मामलों के आधार पर उसकी निगरानी जरूरी थी।
पीठ ने याचिकाकर्ता के रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि उसका आपराधिक प्रोफाइल किसी पेशेवर या विशेषज्ञ अपराधी जैसा नहीं है, जिस पर आजीवन निगरानी रखी जाए। हाईकोर्ट ने प्रयागराज के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) और पुलिस उपायुक्त (शहर) की कार्यशैली की आलोचना करते हुए कहा कि एक सम्मानित और सक्रिय वकील पर इस तरह स्थायी निगरानी थोपना उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है।

