बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपनी ही 12 वर्षीय नाबालिग बेटी का यौन शोषण करने वाले एक व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी पिता द्वारा अपनी ही संतान के साथ ऐसा घिनौना कृत्य करना बेहद चौंकाने वाला और गंभीर अपराध है। अदालत ने रेखांकित किया कि बलात्कार केवल एक शारीरिक हमला नहीं है, बल्कि यह पीड़िता के पूरे व्यक्तित्व को नष्ट कर देता है, इसलिए ऐसे संवेदनशील मामलों को बेहद संवेदनशीलता के साथ निपटाया जाना चाहिए।
जस्टिस उर्मिला जोशी फालके और जस्टिस निवेदिता पी मेहता की पीठ ने 15 जुलाई को दिए अपने फैसले में एक भावुक टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि एक बेटी अपने पिता की गोद से तो बड़ी हो सकती है, लेकिन उसके दिल से कभी बाहर नहीं होती। अदालत ने कहा कि आरोपी पिता, जो बच्ची का रक्षक था, उसने उस भरोसे का कत्ल किया जो एक बच्चा अपने माता-पिता पर करता है। उसने अपनी ही बेटी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को तबाह कर उसका भविष्य उजाड़ दिया और उसकी आत्मा को गहरी ठेस पहुंचाई।
मामले की पृष्ठभूमि और आशा वर्कर की सक्रियता
यह मामला अप्रैल 2021 का है। 14 अप्रैल 2021 को एक स्थानीय गांव में सर्वे के दौरान एक आशा (ASHA) कार्यकर्ता की नजर पीड़िता पर पड़ी। आशा कार्यकर्ता पीड़िता को पहले से जानती थी और उसे बच्ची के गर्भवती होने का संदेह हुआ। इसके अगले दिन, 15 अप्रैल 2021 को वह बच्ची को स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गई, जहां से उसे सामान्य अस्पताल रेफर किया गया।
अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों ने पुष्टि की कि 12 वर्षीय बच्ची 27 सप्ताह की गर्भवती थी। पूछताछ करने पर डरी हुई बच्ची ने अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में कुछ नहीं बताया। इसके बाद आशा कार्यकर्ता ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 15 अप्रैल को ही पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
डीएनए जांच से खुला आरोपी पिता का राज
पुलिस जांच के दौरान पीड़िता ने एक बच्चे को जन्म दिया। जांच का रुख पीड़िता के पिता की तरफ मुड़ा, जिसके बाद पुलिस ने 16 सितंबर 2021 को उसे गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने नवजात शिशु का डीएनए (DNA) टेस्ट कराया। डीएनए रिपोर्ट में बच्चे के जैविक पिता के रूप में आरोपी का मिलान हुआ, जिससे मामले की कड़ियां पूरी तरह जुड़ गईं।
इसके बाद निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने पिता को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून, 2012 के तहत ‘गंभीर पैठ वाले यौन हमले’ (एग्रवेटेड पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की सुसंगत धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
बचाव पक्ष और सरकारी वकील की दलीलें
हाईकोर्ट में अपील के दौरान दोषी के वकील एडवोकेट के.जी. राठी ने तर्क दिया कि पीड़िता ने अपने पिता को झूठा फंसाया है, क्योंकि पिता ने उसे बिना बताए गांव में घूमने के लिए डांटा था। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि आरोपी को केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया था और उसके डीएनए नमूने सही तरीके से नहीं लिए गए थे, जिससे डीएनए रिपोर्ट संदेहास्पद हो जाती है।
वहीं, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहीं अतिरिक्त लोक अभियोजक (Additional Public Prosecutor) शमसी हैदर ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि डीएनए रिपोर्ट से अभियोजन पक्ष का मामला अकाट्य रूप से साबित होता है और सबूतों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की कोई गुंजाइश नहीं थी। उन्होंने दलील दी कि डॉक्टरों की गवाही ने मामले की कड़ियों को पूरी तरह जोड़ दिया है।
पीड़िता की चुप्पी और कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट की पीठ ने बचाव पक्ष के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि मामले से जुड़े कई मुख्य तथ्य निर्विवाद हैं। घटना के समय पीड़िता की उम्र महज 12 वर्ष थी, वह आर्थिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह अपने पिता पर निर्भर थी, और घटना से पहले ही उसकी मां का निधन हो चुका था।
अदालत ने कहा कि ऐसी बेसहारा स्थिति में पीड़िता का तुरंत अपने पिता का नाम न उजागर करना पूरी तरह स्वाभाविक और जायज था। आरोपी ने अपने दबदबे और विश्वास की स्थिति का नाजायज फायदा उठाकर अपनी हवस पूरी की, जिसके गहरे जख्म और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पीड़िता को ताउम्र झेलने होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता को बिना किसी डर, खतरे या असुरक्षा के जीने का मौलिक अधिकार है, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को उम्रकैद की सजा देना पूरी तरह न्यायसंगत था।

