सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष यदि कोई कार्यवाही एकपक्षीय (एक्स-पार्टी) हुई है, तो किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने वाले फैसले को तब तक बरकरार नहीं रखा जा सकता जब तक कि कानूनी, निष्पक्ष और तार्किक सुनवाई की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी न की गई हों। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के उन विभिन्न आदेशों को खारिज कर दिया, जिन्होंने ट्रिब्यूनल के ऐसे एकपक्षीय फैसलों की पुष्टि की थी। सुप्रीम कोर्ट ने असम के संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स को इन मामलों को वापस भेजते हुए सख्त दिशानिर्देशों के तहत नए सिरे से योग्यता के आधार पर सुनवाई करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला असम राज्य के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स और कुछ पुराने मामलों में तत्कालीन ‘अवैध प्रवासी (निर्धारण) न्यायाधिकरण’ (आईएमडीटी) के समक्ष चल रही कार्यवाहियों से जुड़ा है। इन सभी मामलों में अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित कर दिया गया था। बाद में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी ट्रिब्यूनल के इन निर्णयों की पुष्टि कर दी थी।
अपीलकर्ताओं की मुख्य शिकायत यह थी कि उन्हें विदेशी घोषित करने की कार्यवाही या तो पूरी तरह से एकपक्षीय थी या फिर बीच में ही उनके अनुपस्थित होने के चलते एकपक्षीय हो गई थी, जिससे उन्हें अपना पक्ष रखने का वास्तविक मौका नहीं मिल पाया। सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रक्रियाओं में हुई कमियों को गहराई से समझने के लिए अपीलों को तीन अलग-अलग श्रेणियों में बांटा:
- पहली श्रेणी: वे अपीलकर्ता जो नोटिस तामील होने का रिकॉर्ड होने के बावजूद कभी ट्रिब्यूनल के सामने पेश नहीं हुए।
- दूसरी श्रेणी: वे मामले जहां हाईकोर्ट ने एकपक्षीय निर्णयों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करते समय पहली बार रिट कार्यवाही के दौरान खुद ही दस्तावेजों और सबूतों का आकलन करना शुरू कर दिया।
- तीसरी श्रेणी: वे अपीलकर्ता जो शुरुआत में ट्रिब्यूनल के समक्ष उपस्थित हुए और शुरुआती कदम भी उठाए, लेकिन बाद में उपस्थित नहीं हो सके, जिससे उनके खिलाफ एकपक्षीय फैसला आया।
कानूनी ढांचा और पक्षकारों की दलीलें
इस मामले का मुख्य कानूनी बिंदु यह था कि क्या किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर और जीवन को प्रभावित करने वाला फैसला मशीनी तौर पर लिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 का सूक्ष्म विश्लेषण किया। यह धारा स्पष्ट करती है कि यह साबित करने की जिम्मेदारी कि कोई व्यक्ति विदेशी नहीं है, उसी व्यक्ति पर होती है। अदालत ने माना कि यह कानूनी जिम्मेदारी तर्कसंगत है क्योंकि जन्म, माता-पिता, निवास और वंश से जुड़े तथ्य केवल उसी व्यक्ति की निजी जानकारी में होते हैं जिसके खिलाफ कार्यवाही चल रही है।
हालांकि, अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सबूत पेश करने की इस जिम्मेदारी को फॉरेनर्स (ट्रिब्यूनल) ऑर्डर, 1964 के पैरा 3 के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। इस प्रावधान के तहत, आरोपित व्यक्ति को उन ‘मुख्य आधारों’ (मेन ग्राउंड्स) का नोटिस दिया जाना चाहिए जिन पर उसे विदेशी माना गया है। यह केवल संदेह के सामान्य दावों से ऊपर होना चाहिए। आरोपी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने, सबूत पेश करने और अपनी बात कहने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।
संवैधानिक विश्लेषण और निष्पक्ष प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1946 के अधिनियम की धारा 9 के तहत दी गई सबूत पेश करने की जिम्मेदारी का उपयोग खुद कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता।
पीठ ने मोहम्मद रहीम अली उर्फ अब्दुर रहीम बनाम असम राज्य और अन्य (2024) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 9 प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को खारिज नहीं करती है। किसी भी व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह यह साबित करे कि वह विदेशी नहीं है, जब तक कि उसे स्पष्ट रूप से यह न बताया जाए कि उसके खिलाफ आरोपों का ठोस आधार क्या है।
अदालत ने अपने फैसले को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के साथ जोड़ा। अदालत ने कहा कि समानता और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण का अधिकार भारत की सीमा के भीतर मौजूद “किसी भी व्यक्ति” को प्राप्त है, यह केवल नागरिकों तक सीमित नहीं है। अदालत ने लुइस डी रायडेट बनाम भारत संघ (1991) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य (1996) के मामलों का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि जिनकी नागरिकता विवादित है, वे भी अनुच्छेद 21 के तहत पूरी तरह से सुरक्षा के हकदार हैं।
इसके अलावा, मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि कानून द्वारा निर्धारित कोई भी प्रक्रिया “निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित” होनी चाहिए; यह “काल्पनिक, दमनकारी या मनमानी” नहीं हो सकती। दोनों पक्षों को सुने जाने के सिद्धांत (ऑडी अल्टरम पार्टम) का समर्थन करते हुए और कूपर बनाम वांड्सवर्थ बोर्ड ऑफ वर्क्स (1863), ए.के. क्राइपाक बनाम भारत संघ (1969) और केनरा बैंक बनाम देबाशीष दास (2003) जैसे मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जवाब देने का अवसर प्रभावी और वास्तविक होना चाहिए।
संवैधानिक और कानूनी संतुलन पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:
“आरोपी व्यक्ति पर सबूत पेश करने की जिम्मेदारी एक कानूनी प्रक्रिया के तहत काम करती है। यह स्वयं कानूनी प्रक्रिया की जगह नहीं ले सकती।”
एकपक्षीय मामलों में ट्रिब्यूनल की जिम्मेदारियों पर कोर्ट ने कहा:
“एकपक्षीय (एक्स-पार्टी) कार्यवाही में अनुपस्थित पक्ष की भागीदारी को तो टाला जा सकता है, लेकिन यह ट्रिब्यूनल को निष्पक्ष विचार और सार्थक न्यायनिर्णयन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती।”
नागरिकता की जांच के दौरान संवैधानिक अधिकारों के लागू होने पर अदालत ने कहा:
“इसलिए, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी उस चरण में भी लागू होती है, जब उस व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति खुद जांच के दायरे में हो।”
तीनों श्रेणियों पर अदालत का निष्कर्ष
सुनवाई के दौरान अनुपस्थिति की तीनों श्रेणियों पर अदालत ने निम्नलिखित निष्कर्ष दिए:
- पहली श्रेणी (अनुपस्थिति): हालांकि ट्रिब्यूनल इन मामलों को अनिश्चित काल के लिए लंबित रखने को बाध्य नहीं हैं, फिर भी आरोपी की अनुपस्थिति ट्रिब्यूनल को इस बात की जांच करने के दायित्व से मुक्त नहीं करती कि राज्य द्वारा पेश की गई सामग्री में दम है या नहीं। आरोपी की अनुपस्थिति को आरोपों के अकाट्य प्रमाण के रूप में नहीं देखा जा सकता।
- दूसरी श्रेणी (हाईकोर्ट द्वारा सबूतों का मूल्यांकन): अदालत ने स्पष्ट किया कि गुवाहाटी हाईकोर्ट को उन दस्तावेजों के मूल्यांकन के लिए प्राथमिक मंच के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए जिन्हें कभी मूल ट्रिब्यूनल के सामने परखा ही नहीं गया था।
- तीसरी श्रेणी (कार्यवाही के बीच में अनुपस्थित होना): यद्यपि अदालत ने उन आरोपियों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये की आलोचना की जो एक बार पेश होने के बाद गायब हो गए, फिर भी अदालत ने कहा कि किसी को विदेशी घोषित करने के गंभीर परिणामों को देखते हुए सबूतों के आधार पर पूरी और तार्किक सुनवाई जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलों को स्वीकार करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसलों और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स (या आईएमडीटी) के निर्णयों को रद्द कर दिया। अदालत ने साफ किया कि उसने व्यक्तिगत नागरिकता के दावों की योग्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। अदालत ने सभी मामलों को नए सिरे से निष्पक्ष सुनवाई के लिए संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स को वापस भेज दिया।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस निर्णय का उपयोग केवल देरी करने के लिए न किया जाए, अदालत ने सख्त शर्तें लागू की हैं:
- सभी अपीलकर्ताओं को इस फैसले की तारीख से चार सप्ताह के भीतर संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के सामने पेश होना होगा।
- पेश होने के बाद, ट्रिब्यूनल अपीलकर्ताओं को एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपना लिखित बयान, दस्तावेज और साक्ष्य के हलफनामे दाखिल करने की अनुमति देगा।
- राज्य और संबंधित जांच अधिकारियों को भी कानून के दायरे में नए साक्ष्य और सामग्री पेश करने की पूरी छूट होगी।
- जब तक नए फैसले नहीं आ जाते, अपीलकर्ताओं के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या दमनकारी कदम नहीं उठाया जाएगा, बशर्ते वे ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश हों और कार्यवाही में सहयोग करें।
- यदि कोई अपीलकर्ता तय समय में पेश नहीं होता या सहयोग नहीं करता, तो ट्रिब्यूनल कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र होगा।
- ट्रिब्यूनल इन वापस भेजे गए मामलों को जल्द से जल्द, अधिमानतः अपीलकर्ताओं के पहली बार पेश होने के छह महीने के भीतर निपटाने का प्रयास करेंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सावित्री डे उर्फ स्वास्थी डे और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2820/2024 (संबद्ध मामलों के साथ)
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई, 2026

