मालकिन की संपत्ति हड़पने के लिए फर्जी गोदनामा तैयार करने के आरोपी घरेलू सहायक को हाईकोर्ट से मिली जमानत

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक घरेलू सहायक को जमानत दे दी है, जिस पर अपनी दिवंगत मालकिन की संपत्ति पर दावा करने के लिए फर्जी गोदनामा और दस्तावेज तैयार करने का आरोप है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुनवाई से पहले की हिरासत को सजा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और जमानत एक सामान्य नियम है, जबकि जेल जाना एक अपवाद है।

जस्टिस मनीषा बत्रा ने 10 जुलाई को दिए अपने फैसले में कहा कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आरोपी इस साल मार्च के आखिर से हिरासत में है। उन्होंने कहा कि मुकदमा जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है, इसलिए आरोपी को और अधिक समय तक जेल में रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। हाईकोर्ट ने आरोपी को निजी मुचलके और मुचलकेदार पेश करने पर रिहा करने का निर्देश दिया।

चोरी की शिकायत से खुला फर्जीवाड़े का मामला

इस पूरे विवाद की शुरुआत मृतक महिला के देवर द्वारा दर्ज कराई गई एक पुलिस शिकायत से हुई थी। प्राथमिक रिपोर्ट (FIR) के अनुसार, महिला की मृत्यु के बाद उनके परिवार ने घर से सीसीटीवी कैमरे सहित कुछ घरेलू सामान गायब पाया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने घरेलू नौकर पर दिवंगत महिला की संपत्ति को धोखाधड़ी से अपने नाम ट्रांसफर कराने का गंभीर आरोप लगाया।

संपत्ति हड़पने के लिए दस्तावेज तैयार करने का आरोप

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पुलिस जांच के अनुसार, आरोपी ने संपत्ति पर मालिकाना हक जताने के लिए एक फर्जी हस्तांतरण विलेख (कन्वेयंस डीड), एक अनाधिकृत हलफनामा और महिला का मृत्यु प्रमाण पत्र इस्तेमाल किया था। इसके बाद उसने खुद को कानूनी वारिस बताते हुए कोर्ट में उत्तराधिकार याचिका (सक्सेशन पिटीशन) दायर कर दी। पुलिस का आरोप है कि अवैध आर्थिक लाभ कमाने के इरादे से इन दस्तावेजों के साथ-साथ एक फर्जी गोदनामा (एडॉप्शन डीड) भी तैयार किया गया था। इस मामले में पुलिस ने आरोपी को 26 मार्च, 2026 को गिरफ्तार किया था।

बचाव और अभियोजन पक्ष की दलीलें

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आरोपी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता सुशील जैन ने अदालत में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि दिवंगत मालकिन ने साल 1990 में उनके मुवक्किल को तब गोद लिया था जब वह केवल तीन साल का था, और उसे हमेशा अपने बेटे की तरह पाला। वकील ने इसके समर्थन में दस्तावेज भी पेश किए और कहा कि आरोपी का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, इसलिए उसे और हिरासत में रखने का कोई कानूनी उद्देश्य नहीं है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील अधिवक्ता अनिल राठी ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि आरोपी ने गलत इरादे से संपत्ति हड़पने के लिए गंभीर जालसाजी की है, जिसे देखते हुए वह जमानत का हकदार नहीं है।

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हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि धोखाधड़ी के आरोपों की सत्यता का फैसला केवल मुकदमा पूरा होने और सबूतों के मूल्यांकन के बाद ही किया जा सकेगा। कोर्ट ने हिरासत की अवधि और जांच पूरी होने के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आरोपी की जमानत मंजूर कर ली।

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