कैंसर पीड़ित पत्नी की देखभाल के लिए जीपीएस ट्रैकर पहनने को तैयार अल फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन, दिल्ली हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को अल फलाह यूनिवर्सिटी ग्रुप के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। दो अलग-अलग मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में जेल में बंद सिद्दीकी ने अपनी गंभीर रूप से बीमार पत्नी की देखभाल के लिए कोर्ट से छह हफ्ते की अस्थायी रिहाई की गुहार लगाई है। जमानत की शर्त के तौर पर उन्होंने अपनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जीपीएस ट्रैकर बैंड (GPS tracker band) पहनने तक की पेशकश की है। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि वह जल्द ही इस पर अपना आदेश जारी करेंगे।

दोनों पक्षों की दलीलें और जीपीएस की पेशकश

सुनवाई के दौरान जवाद अहमद सिद्दीकी के वरिष्ठ वकील विक्रम चौधरी ने दलील दी कि उनकी पत्नी ओवेरियन कैंसर के चौथे चरण (स्टेज 4) से जूझ रही हैं और उनकी स्थिति काफी नाजुक है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 15 जुलाई को उनकी पत्नी की अगली कीमोथेरेपी होनी है, इसलिए जीवन के इस मोड़ पर सिद्दीकी का उनके साथ रहना बेहद जरूरी है। बचाव पक्ष ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि अगर सिद्दीकी को अंतरिम जमानत दी जाती है, तो वे जीपीएस ट्रैकर पहनने को भी तैयार हैं। सिद्दीकी ने निचली अदालत के 9 जून के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।

प्रवर्तन निदेशालय का कड़ा विरोध

दूसरी तरफ, प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जोहेब हुसैन ने इस जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। जांच एजेंसी ने आशंका जताई कि अगर सिद्दीकी को रिहा किया गया, तो वे सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं या कानून की प्रक्रिया से भाग सकते हैं। ईडी ने सुझाव दिया कि सिद्दीकी को जमानत देने के बजाय कस्टडी परोल (हिरासत में मुलाकात) की मंजूरी दी जा सकती है ताकि वे पुलिस सुरक्षा के साए में अपनी पत्नी से मिल सकें।

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ईडी के वकील ने आरोपी की पत्नी की गंभीर स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि मरीज इलाज का अच्छा रिस्पॉन्स दे रही हैं। उन्होंने यह दलील भी दी कि अगर उनकी हालत वाकई जानलेवा होती, तो विदेश में रहने वाले उनके बच्चे भारत लौट आते, लेकिन अब तक उनका कोई भी बच्चा वापस नहीं आया है। इसके अलावा, ईडी ने सिद्दीकी को आदतन अपराधी बताते हुए आरोप लगाया कि वे साल 2025 में लाल किले के पास हुए बम धमाके के मामले में भी संलिप्त थे। हालांकि, सिद्दीकी के वकील ने इस आरोप का पुरजोर खंडन किया और स्पष्ट किया कि इस धमाके की एफआईआर या चार्जशीट में सिद्दीकी को आरोपी के रूप में नामजद नहीं किया गया है।

मनी लॉन्ड्रिंग और करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी के आरोप

जवाद अहमद सिद्दीकी फिलहाल मनी लॉन्ड्रिंग के दो अलग-अलग मामलों में हिरासत में हैं। पहला मामला फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी के छात्रों से वसूली गई फीस से अवैध धन जुटाने से जुड़ा है। ईडी ने उन्हें इस मामले में 18 नवंबर 2025 को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत गिरफ्तार किया था।

यह मामला दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा दर्ज दो एफआईआर पर आधारित है। आरोप है कि अल फलाह यूनिवर्सिटी ने छात्रों और अभिभावकों को गुमराह करने के लिए झूठा दावा किया था कि उसे राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) से मान्यता और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से मंजूरी मिली हुई है। ईडी के मुताबिक, इस धोखाधड़ी के जरिए साल 2018 से 2025 के बीच करीब 415.10 करोड़ रुपये जुटाए गए, जिसे सिद्दीकी ने अपने निजी इस्तेमाल के लिए डायवर्ट कर लिया। इसके बाद, ईडी ने उन्हें दिल्ली में 45 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन के कथित रूप से अवैध और फर्जी अधिग्रहण से जुड़े एक अन्य मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दोबारा गिरफ्तार किया।

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सफेदपोश आतंकवाद की जांच के घेरे में यूनिवर्सिटी

वित्तीय अनियमितताओं के अलावा, अल फलाह यूनिवर्सिटी का नाम ‘व्हाइट-कॉलर टेरर’ (सफेदपोश आतंकवाद) की जांच में भी सामने आ चुका है। इस जांच के सिलसिले में यूनिवर्सिटी से जुड़े दो डॉक्टरों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, इस यूनिवर्सिटी के अस्पताल से जुड़े एक अन्य डॉक्टर उमर-उन-नबी की पहचान 10 नवंबर 2025 को लाल किले के बाहर हुए आत्मघाती हमले के मुख्य हमलावर के रूप में हुई थी। इस आतंकी हमले में 15 लोगों की मौत हो गई थी।

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