दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले में अगर कोई आरोपी सरकारी गवाह (approver) बनकर माफी मांगना चाहता है, तो मामले का दूसरा सह-आरोपी इसका विरोध नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपी के पास इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
जस्टिस जसमीत सिंह ने अपने फैसले में कहा कि सह-आरोपी को अपनी बात रखने और गवाह की सच्चाई को परखने का असली अवसर ट्रायल (मुकदमे की सुनवाई) के दौरान ही मिलता है। ट्रायल के चरण में सह-आरोपी सरकारी गवाह से जिरह (cross-examination) कर उसकी गवाही की विश्वसनीयता को अदालत के सामने चुनौती दे सकता है।
ट्रायल के दौरान सुरक्षा और सीआरपीसी की धारा 306
4 जुलाई के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 306 का ढांचा हर सह-आरोपी को माफी दिए जाने की प्रक्रिया के दौरान सुने जाने का अधिकार नहीं देता। कोर्ट के मुताबिक, किसी आरोपी को माफी देने मात्र से दूसरे सह-आरोपियों के अधिकारों का हनन नहीं होता और न ही इससे सीधे तौर पर उन्हें दोषी मान लिया जाता है।
अदालत ने समझाया कि सरकारी गवाह के बयानों को सबूत के तौर पर तभी स्वीकार किया जाता है जब ट्रायल कोर्ट में उसकी औपचारिक गवाही दर्ज हो जाए और उस पर जिरह पूरी हो चुकी हो। बचाव पक्ष को गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का पूरा और प्रभावी अवसर केवल ट्रायल के दौरान ही उपलब्ध होता है।
आरोपी कंपनी की याचिका खारिज
हाईकोर्ट का यह फैसला मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में शामिल आरोपी कंपनी की याचिका पर आया है। इस कंपनी ने साल 2024 के उस अदालती आदेश को वापस लेने (रिकॉल करने) की मांग की थी, जिसके तहत मामले के एक अन्य आरोपी को सरकारी गवाह बनने की अनुमति दी गई थी। याचिकाकर्ता कंपनी का तर्क था कि वह इस मामले में एक आवश्यक पक्ष है और उसे सुने बिना ही यह आदेश पारित कर दिया गया, जो कि गलत है।
जस्टिस सिंह ने कंपनी की इन आशंकाओं को समय से पहले बताते हुए याचिका को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट और देश की अन्य अदालतों के पिछले फैसलों में यह पहले ही साफ हो चुका है कि सह-आरोपी के अधिकार ट्रायल शुरू होने के बाद ही वजूद में आते हैं। माफी की प्रक्रिया के दौरान उन्हें सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पिछले आदेश में प्रक्रियाओं या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

