उत्तर प्रदेश में टेट्रा पैक में शराब की बिक्री पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार; याचिकाकर्ता को राज्य सरकार के पास जाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में टेट्रा पैक में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता को छूट दी है कि वे अपनी शिकायतों को लेकर राज्य सरकार के अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखें।

गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश की नई आबकारी नीति को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता का तर्क था कि देसी शराब को कांच की बोतलों के बजाय टेट्रा पैक में बेचने से शैक्षणिक संस्थानों का माहौल खराब होगा और अपराधों में वृद्धि हो सकती है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इन शिकायतों का निवारण पहले राज्य प्रशासन के स्तर पर होना चाहिए।

यह कानूनी चुनौती उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में मंजूर की गई नई आबकारी नीति के बाद सामने आई है, जिसका उद्देश्य शराब वितरण प्रणाली का आधुनिकीकरण करना है। इस नीति की प्रमुख विशेषताओं में शराब और ‘भांग’ की दुकानों के आवंटन के लिए ई-लॉटरी प्रणाली की शुरुआत शामिल है।

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नीति में एक बड़ा तकनीकी बदलाव यह किया गया है कि देसी शराब, जो पहले कांच की बोतलों में बेची जाती थी, अब अनिवार्य रूप से टेट्रा पैक में पैक की जाएगी। राज्य सरकार ने इस बदलाव के पीछे सुरक्षा बढ़ाने, मिलावट रोकने और उत्पाद की शुद्धता सुनिश्चित करने का तर्क दिया है।

याचिकाकर्ता मीनाक्षी श्री तिवारी की ओर से पेश वकील अशोक पांडे ने नई पैकेजिंग की सुलभता और इसके सामाजिक प्रभाव पर चिंता जताई। पांडे ने दलील दी कि टेट्रा पैक को ले जाना आसान है, जिसकी वजह से ये राज्य के शैक्षणिक संस्थानों तक आसानी से पहुंच रहे हैं और स्कूलों-कॉलेजों के माहौल को प्रभावित कर रहे हैं।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने टेट्रा पैक के कारण होने वाली आसान बिक्री और खपत को राज्य में बढ़ते अपराधों का एक मुख्य कारण बताया। जनहित याचिका के माध्यम से मांग की गई थी कि टेट्रा पैक में शराब की पैकेजिंग के राज्य सरकार के आदेश को रद्द किया जाए।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ इस चरण में राज्य के नीतिगत निर्णय में हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं थी।

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जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए पीठ ने इसे निपटा दिया, लेकिन याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का एक विकल्प दिया। अदालत ने तिवारी को उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित अधिकारियों को एक प्रतिनिधित्व (representation) सौंपने की स्वतंत्रता दी। पीठ ने नोट किया कि राज्य सरकार को इस प्रतिनिधित्व पर विचार करना होगा और उठाई गई शिकायतों पर अपना निर्णय लेना होगा।

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