सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें राष्ट्रीय ध्वज पर अशोक चक्र के प्रदर्शन के लिए केंद्र सरकार को विशिष्ट दिशा-निर्देश तय करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को “भावुक” मुद्दों पर मुकदमेबाजी करने के बजाय समाज के लिए रचनात्मक कार्य करने की सलाह दी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने व्यक्तिगत रूप से पेश हुए याचिकाकर्ता की दलीलें सुनीं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने वाराणसी के एक चौराहे पर स्थापित अशोक चक्र की तस्वीर दिखाते हुए दावा किया कि इसके प्रदर्शन में अनियमितताएं हैं और इसके लिए मानक प्रोटोकॉल की आवश्यकता है।
हालांकि, अदालत याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमत नहीं दिखी। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि भले ही याचिकाकर्ता की मंशा अच्छी हो सकती है, लेकिन यह मामला न्यायिक हस्तक्षेप के लायक नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से कहा, “इन चीजों को लेकर इतना भावुक होने की जरूरत नहीं है। आपका विचार अच्छा है। आपने अधिकारियों को सूचित कर दिया है। अब यह अधिकारियों को देखना है कि वे क्या करना चाहते हैं।”
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका का समय अधिक गंभीर सामाजिक मुद्दों पर खर्च होना चाहिए। केंद्र या अन्य अधिकारियों को कोई भी निर्देश देने से इनकार करते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी ऊर्जा अधिक प्रभावशाली कार्यों में लगाने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यवाही समाप्त करते हुए पीठ ने कहा, “आप समाज के लिए कुछ रचनात्मक कार्य करें।”
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि जब संबंधित अधिकारियों को सुझावों से अवगत करा दिया गया हो, तो अदालत राष्ट्रीय प्रतीकों से संबंधित प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की इच्छुक नहीं है।

