शादी का पुख्ता सबूत न होना गुजारा भत्ते के दावे को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता, अगर दोनों पति-पत्नी की तरह रह रहे थे: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनके संबंध स्थापित हो चुके हों, तो केवल शादी के पुख्ता सबूत न होने के आधार पर महिला के गुजारा भत्ते के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने एक पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक महिला को वैध पत्नी न मानते हुए उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने मामले को वापस निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) को भेजते हुए नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता (पत्नी) ने वर्ष 2019 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अपने लिए 25,000 रुपये और अपने नाबालिग बेटे के लिए 15,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ते की मांग करते हुए आवेदन किया था। उसका कहना था कि उसने सितंबर 2017 में विपक्षी पक्ष संख्या 2 (पति) के साथ कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था। लेकिन शादी के तुरंत बाद, उसके पति और ससुराल वालों ने दहेज के लिए, विशेष रूप से एक चार पहिया वाहन की मांग करते हुए उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसे पीटा गया और ससुराल से निकाल दिया गया। इसके बाद, गाँव के बुजुर्गों के हस्तक्षेप पर पति उसे गोरखपुर स्थित अपने सरकारी आवास पर ले गया, जहाँ दोनों साथ रहे और उसने एक बेटे को जन्म दिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसके बावजूद मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना जारी रही और अंततः मार्च 2019 में उसे बेरहमी से पीटकर घर से निकाल दिया गया। तब से वह अपने मायके में रह रही है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है, जबकि उसका पति एक डिग्री कॉलेज में लैब टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत है और उसकी कृषि से भी आय है।

महाराजगंज की पारिवारिक अदालत के प्रिंसिपल जज ने मार्च 2024 में याचिकाकर्ता का गुजारा भत्ता इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह खुद को वैध पत्नी साबित करने में विफल रही। हालांकि, अदालत ने उसके नाबालिग बच्चे को “अवैध संतान” बताते हुए उसके लिए 5,000 रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता मंजूर किया। इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।

दोनों पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि वह वास्तव में विपक्षी पक्ष संख्या 2 की पत्नी है, उसे घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है और वह अपना और अपने बच्चे का भरण-पोषण करने में असमर्थ है।

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दूसरी ओर, विपक्षी पक्ष (पति) के वकील ने तर्क दिया कि कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन जरूर किया गया था, लेकिन शादी कभी कानूनी रूप से पूरी नहीं हुई। उन्होंने दावा किया कि याचिकाकर्ता और उसके परिवार के दबाव और झूठे मामलों की धमकियों के कारण वह उसे गोरखपुर स्थित अपने सरकारी आवास में रखने के लिए मजबूर हुआ था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता झगड़ालू थी, घरेलू जिम्मेदारियों की उपेक्षा करती थी और उसके अन्य संबंध भी थे, जिसके कारण उसने अपनी सुरक्षा के लिए तलाक की याचिका दायर की थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

रिकॉर्ड की समीक्षा करने के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने केवल इस आधार पर शादी की बात को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता ने विवाह अधिकारी के समक्ष दिए गए नोटिस की केवल फोटोकॉपी पेश की थी। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सहजीवन (Cohabitation) और बच्चे के जन्म के स्थापित तथ्यों की अनदेखी करते हुए बिना किसी ठोस कारण के यह निष्कर्ष निकाला।

निचली अदालत के इस रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“जिस तरह से इस मुद्दे को निपटाया गया है, उसमें इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा गया कि भले ही याचिकाकर्ता नंबर 1 अपनी शादी को साबित करने में पूरी तरह सफल नहीं रही हो, लेकिन वे दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी के रिश्ते में रहे और इस रिश्ते से एक बेटे का जन्म हुआ। याचिकाकर्ता की पात्रता का आकलन करते समय ऐसा दृष्टिकोण अपनाना बिना न्यायिक दिमाग का इस्तेमाल किए यांत्रिक और सतही तरीके से काम करने को दर्शाता है। ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों और बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों की पूरी तरह से अनदेखी की, जो यह साबित करते हैं कि बच्चा विपक्षी पक्ष का ही बेटा है।”

अदालत ने रेखांकित किया कि पति ने खुद कोर्ट मैरिज के आवेदन, सहजीवन और बच्चे के जन्म की बात को स्वीकार किया है।

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले बादशाह बनाम उर्मिला बादशाह गोडसे [(2014) 1 SCC 188] का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125 के मामलों में तकनीकी व्याख्याओं के बजाय एक सामाजिक और कल्याणकारी दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शब्दों को उद्धृत किया:

“जहाँ एक पुरुष और महिला पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनके संबंध स्थापित हो चुके हों, वहाँ शादी के कड़े सबूत के लिए दबाव नहीं डाला जाना चाहिए ताकि इस कानून के कल्याणकारी उद्देश्य को विफल होने से बचाया जा सके।”

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति, आय और देनदारियों का विवरण देने के लिए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश नहीं दिया, जो कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले रजनेश बनाम नेहा [(2021) 2 SCC 324] के तहत अनिवार्य है। अदालत ने टिप्पणी की:

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“बिना हलफनामों पर विचार किए लिया गया निर्णय सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन है और यह जल्दबाजी में की गई कार्रवाई को दर्शाता है।”

अपनी पुनरीक्षण शक्तियों (Revisional Powers) के संबंध में, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले श्री एम.वी. रामचंद्रसा बनाम महेंद्र वॉच कंपनी [2026 INSC 348] का हवाला दिया और स्पष्ट किया कि एक पुनरीक्षण अदालत अपीलीय अदालत की तरह साक्ष्यों का दोबारा विश्लेषण नहीं कर सकती, जब तक कि निचली अदालत का निष्कर्ष पूरी तरह से कानून के खिलाफ या न्याय के सिद्धांतों के विपरीत न हो। हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा महत्वपूर्ण स्वीकृतियों और परिस्थितियों की अनदेखी करने के कारण हस्तक्षेप करना आवश्यक हो गया था।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। अदालत ने बच्चे के लिए 5,000 रुपये प्रति माह के गुजारा भत्ते को बरकरार रखा, क्योंकि धारा 125 के तहत एक पिता अपने बच्चे (चाहे वह वैध हो या अवैध) का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।

हालांकि, अदालत ने महिला के दावे को खारिज करने वाले पारिवारिक अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने मामले को महाराजगंज की पारिवारिक अदालत के प्रिंसिपल जज के पास वापस भेज दिया ताकि बादशाह मामले में तय सिद्धांतों के आलोक में उसकी पात्रता पर नए सिरे से विचार किया जा सके।

इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को रजनेश बनाम नेहा के प्रारूप के अनुसार अपनी आय और संपत्तियों के विस्तृत हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया। निचली अदालत को इन हलफनामों के आधार पर तीन महीने के भीतर इस मामले का त्वरित निपटारा करने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती सुशीला बनाम राजीव कुमार चौधरी
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या – 2024 की 3622
पीठ: जस्टिस अचल सचदेव
निर्णय की तिथि: 10 जुलाई, 2026

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