जमीन के विवादित तथ्यों को सुलझाने या कार्यपालिका के कानून-व्यवस्था संबंधी कर्तव्यों में हस्तक्षेप करने के लिए रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग नहीं किया जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग संपत्ति से जुड़े जटिल और विवादित तथ्यों के निर्धारण के लिए नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही, रिट कोर्ट कानून-व्यवस्था बनाए रखने के कार्यपालिका के प्राथमिक कर्तव्य में भी हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने बोकारो में एक विवादित भूमि पर अतिक्रमण रोकने और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात करने के अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ), चास के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बोकारो जिले (जो पहले धनबाद का हिस्सा था) के मौजा टेटुलिया में स्थित खाता संख्या 26, प्लॉट संख्या 464 की 8 डिसमिल भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता मोहम्मद शाहिद राजा का दावा था कि उनके पिता मोहम्मद खलील अंसारी ने 6 नवंबर 1979 को एक पंजीकृत बिक्री विलेख (सेल डीड) के माध्यम से कुमारी घटवालिन से यह 8 डिसमिल जमीन खरीदी थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस जमीन का दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) हो चुका था, नियमित रूप से लगान चुकाया जा रहा था और उनका परिवार शांतिपूर्वक इस पर काबिज था।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने साल 2012 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर चास के एसडीओ द्वारा 10 अप्रैल 2012 को पारित एक आदेश को चुनौती दी थी। सेक्टर-12 जांच केंद्र के प्रभारी की रिपोर्ट के आधार पर जारी इस प्रशासनिक आदेश में प्रतिवादी संख्या 5, राम बहादुर सिंह का कब्जा सुरक्षित रखने और वहां शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल की तैनाती का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि इस प्रशासनिक कार्रवाई के कारण उन्हें जबरन बेदखल कर दिया गया, इसलिए उन्होंने एसडीओ के आदेश को रद्द करने की मांग की थी।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि राम बहादुर सिंह को कब्जा दिलाने के लिए पुलिस बल की तैनाती का एसडीओ का आदेश पूरी तरह से क्षेत्राधिकार से बाहर था। उन्होंने राज्य की इस कार्रवाई को मनमाना बताते हुए कहा कि इससे याचिकाकर्ता को जबरन बेदखल होना पड़ा। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने पटना हाईकोर्ट के देबा ज्योति दत्ता बनाम बिहार राज्य और झारखंड हाईकोर्ट के शैलेंद्र कुमार गुप्ता बनाम झारखंड राज्य के फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब कानूनी कार्यवाही के अभाव में राज्य मनमाने ढंग से काम करता है, तो हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

दूसरी ओर, राज्य के वकील ने याचिका का पुरजोर विरोध किया। राज्य ने दलील दी कि एसडीओ का आदेश इलाके में केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से जारी किया गया था। राज्य के अनुसार, प्रतिवादी संख्या 5 (राम बहादुर सिंह) ने 20 अगस्त 1979 को मेहर बाबू अंसारी से यह 8 डिसमिल जमीन खरीदी थी, जिसके बाद उन्होंने वहां चहारदीवारी बनाकर मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया था और वे वर्ष 2009 तक नियमित लगान दे रहे थे। जब कुछ लोगों ने जबरन जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की, तो राम बहादुर सिंह ने शिकायत दर्ज कराई। भूमि की आधिकारिक पैमाइश और जांच के बाद, प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और वास्तविक मालिक के कब्जे की सुरक्षा के लिए पुलिस बल तैनात किया था।

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राज्य ने कोर्ट को यह भी सूचित किया कि याचिका लंबित रहने के दौरान 20 सितंबर 2012 को राम बहादुर सिंह ने यह जमीन शारदा देवी (प्रतिवादी संख्या 6) को बेच दी थी। हाईकोर्ट की समन्वय पीठ के निर्देश पर जून 2023 में अंचल अधिकारी (सर्कल ऑफिसर), चास द्वारा की गई भौतिक जांच में पुष्टि हुई कि जमीन पर शारदा देवी का कब्जा है, जहां 7 फीट ऊंची चहारदीवारी, दो एस्बेस्टस के कमरे, एक चापाकल और लोहे का गेट मौजूद है। राज्य और प्रतिवादी संख्या 6 ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता अदालत के समक्ष अपनी बिक्री विलेख (सेल डीड) पेश करने में विफल रहे और उनके दावे में चौहद्दी (सीमा विवरण) का भी उल्लेख नहीं था।

कोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मामले के दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि याचिकाकर्ता ने रिट याचिका के कई पैराग्राफों में सुनवाई के दौरान सेल डीड पेश करने की बात कही थी, लेकिन वे इसे कोर्ट के समक्ष दाखिल करने में पूरी तरह विफल रहे। कोर्ट ने माना कि इस दस्तावेज को न सौंपने के पीछे खरीदी गई जमीन के सटीक क्षेत्रफल और सीमा विवरण को छुपाने की मंशा प्रतीत होती है।

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जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने टिप्पणी की कि अतिक्रमण से जुड़े विवादों में आपसी सहमति वाले मानचित्र (नक्शे) के बिना तथ्यों का निर्धारण नहीं किया जा सकता। अंचल अधिकारी ने प्रतिवादियों की जमीन का सीमांकन किया था, लेकिन याचिकाकर्ता ने भूमि की पहचान के लिए कभी भी सक्षम प्राधिकारी से संपर्क नहीं किया।

अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका की विचारणीयता पर कोर्ट ने एक स्पष्ट निर्णय देते हुए इसके सीमित दायरे को रेखांकित किया:

“सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह के विवादित तथ्यात्मक मामलों में रिट कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आदेश पारित करने के लिए सक्षम है या नहीं? इसका सीधा जवाब ‘नहीं’ है। अगर याचिकाकर्ता ने खुद ही ऐसी बातों को छिपाया है और वह साफ हाथों से हाईकोर्ट नहीं आया है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 226 का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि तथ्य से जुड़े विवादित मामलों का निपटारा केवल दीवानी मुकदमे (सूट) के माध्यम से ही किया जा सकता है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े कार्यपालक कार्यों की न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत अधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णयों का जिक्र करते हुए और सुप्रीम कोर्ट के कर्नाटक राज्य बनाम प्रवीण भाई तोगड़िया (डॉ.) मामले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि प्रशासनिक अधिकारी स्थानीय कानून-व्यवस्था की स्थिति का आकलन करने और उसे संभालने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। अदालतों को सक्षम कार्यपालक अधिकारियों के विचारों के स्थान पर अपने विचार नहीं थोपने चाहिए।

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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 का उपयोग जटिल तथ्यात्मक विवादों को सुलझाने के लिए एक अपीलीय मंच के रूप में नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले सिटी एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन बनाम दोसू आरदेशिर भिवंडीवाला पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने रिट कोर्ट के कर्तव्यों को रेखांकित किया:

“अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते समय न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह इस बात पर विचार करे कि क्या रिट याचिका के निपटारे में तथ्यों से जुड़े कोई जटिल और विवादित प्रश्न शामिल हैं और क्या उनका संतोषजनक समाधान किया जा सकता है।”

याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत कानूनी नजीरों को अलग करते हुए कोर्ट ने पाया कि देबा ज्योति दत्ता और शैलेंद्र कुमार गुप्ता के मामले बिल्कुल अलग तथ्यों पर आधारित थे (क्रमशः लीज नवीनीकरण और बिना मुआवजे के जल निकासी के लिए भूमि अधिग्रहण), इसलिए वे याचिकाकर्ता के मामले में मददगार नहीं हैं।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि एसडीओ के आदेश में कोई अवैधता नहीं थी, क्योंकि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पूरी तरह से जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह देखते हुए कि विवाद में बेहद उलझे हुए तथ्यात्मक मुद्दे शामिल थे जिन्हें केवल दीवानी मुकदमे के जरिए ही हल किया जा सकता है, कोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मोहम्मद शाहिद राजा बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यू. पी. सी. संख्या 4667 वर्ष 2012
पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 07.07.2026

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