22 दिन की गैर-हाजिरी पर जबरन रिटायरमेंट गलत, ओडिशा हाईकोर्ट ने रेलवे कर्मचारी को बहाल करने का दिया आदेश

ओडिशा हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए रेलवे के एक लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारी को दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति (कंपलसरी रिटायरमेंट) की सजा को पूरी तरह रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि बिना मंजूरी के काम से अनुपस्थित रहने को तब तक कदाचार (misconduct) नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि कर्मचारी जानबूझकर ड्यूटी पर नहीं आया।

जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित और जस्टिस चित्तरंजन दास की खंडपीठ ने कर्मचारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के साल 2021 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें रेलवे की इस कार्रवाई को सही ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने रेलवे प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह इस कर्मचारी को उसकी सेवानिवृत्ति की वास्तविक तारीख तक लगातार सेवा में सक्रिय माने। इसके साथ ही कोर्ट ने कर्मचारी को 50 फीसदी पिछला वेतन (बैक वेजेस) देने और अगले 60 दिनों के भीतर संशोधित पेंशन व अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का भी आदेश दिया है।

बिना मंजूरी छुट्टी और जानबूझकर गायब रहना एक समान नहीं

बीते 6 जुलाई को दिए अपने फैसले में खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि अगर किसी कर्मचारी की छुट्टी की अर्जी खारिज कर दी जाती है या उसे मंजूरी नहीं मिलती है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उसकी अनुपस्थिति जानबूझकर या अवज्ञाकारी रुख के कारण थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘अनधिकृत अनुपस्थिति’ (unauthorized absence) और ‘जानबूझकर अनुपस्थित रहना’ (wilful absence) दोनों बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं।

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कर्मचारी के 22 साल के लंबे सेवाकाल के दौरान उस पर बेईमानी, नैतिक पतन, वित्तीय गड़बड़ी, भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता या जनहित को नुकसान पहुंचाने का कोई आरोप नहीं था। रेलवे प्रशासन भी अदालत के सामने ऐसा कोई रिकॉर्ड या सामग्री पेश नहीं कर सका, जिससे कर्मचारी के पहले के किसी कदाचार का पता चलता हो।

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स्टेशन मास्टर से मुख्य कार्यालय अधीक्षक तक का सफर

पीड़ित कर्मचारी साल 1984 में दक्षिण पूर्व रेलवे (South Eastern Railway) में सहायक स्टेशन मास्टर के रूप में शामिल हुए थे। इसके बाद, उन्हें 1987 में स्टेशन मास्टर और 1999 में डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट के पद पर पदोन्नत किया गया। इसी दौरान, 9 दिसंबर 1999 को एक रेल दुर्घटना में घुटने के नीचे से उनका दाहिना पैर काटना पड़ा था।

इलाज और कृत्रिम पैर (प्रोस्थेटिक लिम्ब) लगने के बाद, उन्हें चिकित्सकीय रूप से श्रेणीमुक्त (medically decategorized) कर दिया गया और वे प्रशासनिक भूमिकाओं में आ गए। उन्होंने ऑफिस सुपरिटेंडेंट-II के रूप में काम किया और बाद में पूर्व तटीय रेलवे (East Coast Railway) के संबलपुर मंडल रेलवे प्रबंधक कार्यालय के तहत ऑपरेटिंग विभाग में मुख्य कार्यालय अधीक्षक (चीफ ऑफिस सुपरिटेंडेंट) के पद पर कार्यरत रहे।

एक दशक से लंबा कानूनी विवाद और बीमारी की वजह

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यह विवाद मुख्य रूप से साल 2008 में शुरू हुआ था, जब कर्मचारी ने संबलपुर से टिटलागढ़ ट्रांसफर किए जाने के फैसले को कैट (CAT) में चुनौती दी थी। उन्हें न्यायाधिकरण से अंतरिम रोक मिल गई, जिससे वे संबलपुर में ही काम करते रहे। बाद में अधिकारियों ने संबलपुर में बने रहने के उनके अनुरोध को खारिज कर दिया।

इसके अगले वर्ष (2009 में) कर्मचारी अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए छुट्टी पर चले गए। कर्मचारी का कहना था कि उन्होंने विभाग को सूचित किया था, लेकिन उनकी छुट्टी की अर्जी नामंजूर कर दी गई और उन्हें अनधिकृत रूप से अनुपस्थित घोषित कर दिया गया। करीब साढ़े 22 दिनों की इस अनुपस्थिति के कारण उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू हुई, जिसके बाद साल 2012 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। बाद में अपील करने पर बर्खास्तगी की इस सजा को कम करके ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ में बदल दिया गया। साल 2019 में कर्मचारी ने इस प्रशासनिक फैसले को कैट में चुनौती दी, लेकिन 2021 में कैट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

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सजा का फैसला बेहद सख्त और असंगत

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि भले ही छुट्टी नामंजूर होने से अनधिकृत अनुपस्थिति की बात स्थापित होती हो, लेकिन इससे खुद-ब-खुद कदाचार (misconduct) सिद्ध नहीं हो जाता। सुनवाई के दौरान कर्मचारी ने लगातार यही रुख अपनाया कि वे अपनी गंभीर रूप से बीमार मां की देखभाल और चिकित्सा सहायता के लिए ड्यूटी पर नहीं आ सके थे। जांच रिपोर्ट में भी इस दावे को कहीं भी झूठा, बनावटी या दुर्भावनापूर्ण नहीं पाया गया था।

कोर्ट ने हालांकि यह स्वीकार किया कि इस विवाद को लंबा खींचने में कुछ हद तक कर्मचारी के रवैये की भी भूमिका थी, लेकिन इसके बावजूद साढ़े 22 दिन की अनुपस्थिति के लिए अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसी सजा पूरी तरह से असंगत और अत्यधिक है। खंडपीठ ने अंत में कहा कि प्रशासन ने एक छोटी सी चूक के लिए बर्खास्तगी के बाद की सबसे बड़ी सजा दे दी। यह कदम अनुशासन सुधारने की सीमा लांघकर जरूरत से ज्यादा सख्त सजा देने जैसा है।

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