जम्मू-कश्मीर राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में निजी क्षेत्र की बीमा कंपनी आईसीआईसीआई लोम्बार्ड (ICICI Lombard) को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने कंपनी को आदेश दिया है कि वह बारामूला के एक पीड़ित गृहस्वामी को कुल 22.99 लाख रुपये का दावा और हर्जाना भुगतान करे। यह मामला साल 2017 में आई भीषण बाढ़ के दौरान एक आवासीय मकान को पहुंचे गंभीर नुकसान के क्लेम को अनुचित रूप से खारिज करने से जुड़ा है।
आयोग की अध्यक्ष निगहत सुल्ताना और सदस्य महीप गुप्ता की पीठ ने बारामूला निवासी मोहम्मद इसहाक राथर की याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। आयोग द्वारा तय किए गए मुआवजे के तहत राथर को मकान की भौतिक क्षति के बदले 15 लाख रुपये दिए जाएंगे। इसके अलावा, क्लेम के निपटारे में हुई लंबी देरी के लिए 27 दिसंबर 2017 से 24 जून 2026 तक की अवधि पर 6 फीसदी सालाना ब्याज की दर से 7.64 लाख रुपये का भुगतान किया जाएगा। साथ ही, मानसिक प्रताड़ना और अदालती खर्च की भरपाई के लिए कंपनी को अलग से 35,000 रुपये देने होंगे।
सुनवाई से गायब रही बीमा कंपनी
मोहम्मद इसहाक राथर ने आईसीआईसीआई लोम्बार्ड से अपने आवासीय मकान का 30 लाख रुपये का बीमा कराया था। 6 अप्रैल 2017 को क्षेत्र में हुई मूसलाधार बारिश के बाद आई अचानक बाढ़ से उनके घर को गंभीर नुकसान पहुंचा था। राथर ने जब पॉलिसी के तहत नुकसान की भरपाई के लिए दावा पेश किया, तो बीमा कंपनी ने यह तर्क देते हुए उसे खारिज कर दिया कि यह क्षति बीमा पॉलिसी के दायरे में आने वाली किसी घटना के कारण नहीं हुई है। इसके बाद पीड़ित ने उपभोक्ता आयोग की शरण ली।
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने अपना बचाव करने में गंभीर लापरवाही बरती। आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के प्रतिनिधि 20 अगस्त 2018 को आयोग के सामने पेश तो हुए थे और उन्हें अपना पक्ष व दावे से जुड़ी फाइल पेश करने को कहा गया था, लेकिन इसके बाद वे लगातार छह महीने से अधिक समय तक सुनवाई से गायब रहे। इस लंबी अनुपस्थिति के कारण कंपनी ने अपना लिखित जवाब या कोई भी सबूत दर्ज कराने का कानूनी अधिकार खो दिया। कंपनी ने शिकायतकर्ता या उनके गवाहों से जिरह करने की भी कोई कोशिश नहीं की।
सर्वेक्षक की रिपोर्ट से ही खुली पोल
काफी देरी के बाद, 9 अक्टूबर 2024 को कंपनी के वकील ने आयोग के समक्ष एक ‘नो क्लेम’ सर्वे रिपोर्ट पेश की। हालांकि, आयोग ने पाया कि सर्वेक्षक (सर्वेयर) के अपने ही दस्तावेज बीमा कंपनी के दावों के विपरीत गवाही दे रहे थे। सर्वे रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि संबंधित इमारत अभी भी क्षतिग्रस्त स्थिति में है और इसके विभिन्न हिस्सों में बड़ी दरारें आ चुकी हैं, जबकि फर्श और आसपास की जमीन में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
आयोग ने स्पष्ट तौर पर कहा कि बीमा कंपनी अपने हितों की रक्षा करने और अपना पक्ष मजबूती से रखने में पूरी तरह विफल रही। कंपनी ने आयोग के सामने नुकसान की तस्वीरें तक पेश नहीं कीं, जिससे आयोग खुद इस मामले में किसी स्वतंत्र निष्कर्ष पर पहुंच पाता। चूंकि मकान के पूरी तरह जमींदोज होने का कोई दावा या सबूत नहीं था, इसलिए आयोग ने इसे ‘पूर्ण नुकसान’ (टोटल लॉस) नहीं माना। इसके बजाय, पीठ ने अनुमान के आधार पर कुल बीमा राशि का आधा हिस्सा यानी 15 लाख रुपये का मुआवजा तय करना न्यायसंगत माना।
केस मॉनिटरिंग सिस्टम सुधारने की नसीहत
इस मामले में दिखी प्रशासनिक ढिलाई को देखते हुए उपभोक्ता आयोग ने सभी बीमा कंपनियों और बैंकिंग संस्थानों को अपने केस मॉनिटरिंग सिस्टम में सुधार करने का सुझाव दिया है, ताकि भविष्य में इस तरह के एकतरफा और प्रतिकूल फैसलों से बचा जा सके।
इसके साथ ही, आयोग ने उपभोक्ताओं की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। उपभोक्ता अपनी शिकायतों के निवारण के लिए जम्मू-कश्मीर उपभोक्ता आयोग की हेल्पलाइन 1800 180 7114 या राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन नंबर 1915 पर संपर्क कर सकते हैं।

