एम्बेसेडर होटल खाली कराने के नोटिस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब, बेदखली कार्यवाही पर रोक से इनकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुजान सिंह पार्क में स्थित एम्बेसेडर होटल को खाली कराने के नोटिस के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में संपदा अधिकारी (एस्टेट ऑफिसर) के समक्ष चल रही बेदखली की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।

जस्टिस हरीश वैजनाथन शंकर ने होटल के मालिकाना हक वाली कंपनी ‘सर सोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड’ की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 17 अगस्त को होगी।

याचिकाकर्ता कंपनी के वकील ने कोर्ट में चिंता जताई थी कि संपदा अधिकारी के समक्ष 10 जुलाई को होने वाली सुनवाई के दौरान उनके खिलाफ बेदखली का आदेश जारी किया जा सकता है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया था कि वह संपदा अधिकारी को पहले यह तय करने का निर्देश दे कि सरकारी परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत यह कार्यवाही कानूनी रूप से चलने योग्य (मेंटेनेबल) है या नहीं।

इस पर जस्टिस शंकर ने हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि संपदा अधिकारी एक वैधानिक प्राधिकरण (स्टैच्यूटरी अथॉरिटी) हैं और वे कानून के दायरे में रहकर ही अपना निर्णय लेंगे।

केंद्र सरकार ने याचिका का किया विरोध

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दूसरी तरफ, केंद्र सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि संपदा अधिकारी के समक्ष चल रही कार्यवाही पूरी तरह से स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत हो रही है। सरकारी वकील ने कोर्ट को स्पष्ट किया कि 10 जुलाई की सुनवाई खुद याचिकाकर्ता कंपनी द्वारा दायर किए गए आवेदनों पर विचार करने के लिए ही निर्धारित की गई थी।

1945 के सरकारी ग्रांट को लेकर कानूनी जंग

यह विवाद सुजान सिंह पार्क (उत्तर) में स्थित 7.58 एकड़ की बेशकीमती जमीन से जुड़ा हुआ है। भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) ने 11 जून को एक कारण बताओ नोटिस जारी कर कंपनी से पूछा था कि उन्हें इस संपत्ति से क्यों न बेदखल कर दिया जाए।

इसके खिलाफ कोर्ट पहुंची ‘सर सोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड’ ने दलील दी है कि उसे अनधिकृत कब्जाधारी नहीं कहा जा सकता। कंपनी का दावा है कि उसके पास साल 1945 का एक पंजीकृत सरकारी अनुदान (रजिस्टर्ड गवर्नमेंट ग्रांट) है और वे पिछले आठ दशकों से अधिक समय से इस संपत्ति पर काबिज हैं। कंपनी के अनुसार, संपदा अधिकारी के पास उनके खिलाफ इस तरह की कार्यवाही शुरू करने का कोई कानूनी अधिकार क्षेत्र नहीं है।

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याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी दिया कि हाईकोर्ट में एक अन्य संबंधित कानूनी विवाद पहले से लंबित होने के बावजूद विभाग ने बेदखली की यह नई कार्यवाही शुरू कर दी है।

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