तलाक के मुकदमे के जवाब में की गई कार्रवाई के रूप में दर्ज कराया गया केस कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है: हाईकोर्ट ने ससुराल वालों के खिलाफ धारा 498ए का मामला रद्द किया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पति के रिश्तेदारों (ससुराल वालों) के खिलाफ लंबित घरेलू क्रूरता के मामले को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि यह मामला तलाक की याचिका के जवाब में केवल बदले की भावना से दर्ज कराई गई एक जवाबी कार्रवाई (काउंटर-ब्लास्ट) थी। जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल) ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि विशिष्ट और पुख्ता आरोपों के बिना पति के रिश्तेदारों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए, 323 और 34 के तहत कानूनी कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में याचिकाकर्तागण पति के माता-पिता और करीबी रिश्तेदार हैं। पति और शिकायतकर्ता (पत्नी) का विवाह 28 जनवरी 2014 को हुआ था। शादी के तुरंत बाद पति ने अपनी पत्नी के लिए तत्काल वीजा का प्रबंध किया और यह जोड़ा फरवरी 2014 में अमेरिका चला गया।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अमेरिका पहुंचने के कुछ ही दिनों के भीतर पत्नी ने पति के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करना शुरू कर दिया और भारत में अपने मायके वापस लौटने की मांग करने लगी। इसके बाद, वह 18 अप्रैल 2014 को भारत लौट आई और तब से अपने माता-पिता के साथ ही रह रही है।

इसके विपरीत, पत्नी ने एक लिखित शिकायत दर्ज कराई जिसमें उसने आरोप लगाया कि भारत लौटने के बाद जब वह अपने ससुराल में रह रही थी, तब उसके ससुराल वालों ने दहेज की मांग पूरी न होने पर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।

मुकदमों का घटनाक्रम और दलीलें

सुनवाई के दौरान अदालत ने विवादों के घटनाक्रम पर गौर किया। पति ने 23 जून 2015 को रायगंज के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष विवाह विच्छेद (तलाक) की मांग करते हुए एक वैवाहिक मुकदमा दायर किया था।

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साल 2017 में तलाक के इस मुकदमे का समन मिलने के बाद, पत्नी ने इस मुकदमे को स्थानांतरित करने की प्रार्थना की। इसके तुरंत बाद, 8 फरवरी 2017 को उसने कालियागंज थाने में एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने जांच के बाद ससुराल वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 34 (समान मंशा) के तहत चार्जशीट दायर की। हालांकि, जांच में पत्नी द्वारा लगाए गए आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के आरोप के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिला।

अदालत का विश्लेषण और मिसालों का हवाला

केस डायरी और रिकॉर्ड का मूल्यांकन करते हुए, हाईकोर्ट ने धारा 498ए के तहत दर्ज मुकदमों की प्रकृति और बढ़ते वैवाहिक विवादों का विश्लेषण किया। जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल) ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले दारा लक्ष्मी नारायण और अन्य बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य (2024) का विस्तार से उल्लेख किया, जिसमें क्रूरता और दहेज उत्पीड़न के तत्वों का विश्लेषण किया गया था।

पूरे परिवार को फंसाने की प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया:

“वैवाहिक विवाद से उत्पन्न किसी आपराधिक मामले में परिवार के सदस्यों के केवल नामों का उल्लेख करना, उनकी सक्रिय संलिप्तता को दर्शाने वाले विशिष्ट आरोपों के बिना, शुरुआत में ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए। यह न्यायिक अनुभव से सिद्ध एक सर्वविदित तथ्य है कि जब वैवाहिक कलह से पारिवारिक विवाद उत्पन्न होते हैं, तो पति के परिवार के सभी सदस्यों को फंसाने की प्रवृत्ति होती है। ठोस सबूतों या विशिष्ट आरोपों के बिना लगाए गए ऐसे सामान्य और व्यापक आरोप आपराधिक अभियोजन का आधार नहीं बन सकते।”

अदालत ने बदले की भावना के रूप में इस प्रावधान के दुरुपयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी का भी उल्लेख किया और उद्धृत किया:

“देश भर में वैवाहिक विवादों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसके साथ ही विवाह जैसी संस्था के भीतर कलह और तनाव भी बढ़ा है। परिणामस्वरूप, पत्नी द्वारा पति और उसके परिवार के खिलाफ व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने के हथियार के रूप में आईपीसी की धारा 498ए जैसे प्रावधानों का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले जी.वी. राव बनाम एल.एच.वी. प्रसाद (2000) का भी हवाला दिया, जो वैवाहिक मुकदमों के तेजी से बढ़ने के खिलाफ सचेत करता है:

“हाल के दिनों में वैवाहिक विवादों में भारी उछाल आया है। विवाह एक पवित्र संस्कार है, जिसका मुख्य उद्देश्य युवा जोड़े को जीवन में स्थापित होने और शांति से रहने में मदद करना है। लेकिन वैवाहिक जीवन की छोटी-मोटी तकरारें अचानक बड़ा रूप ले लेती हैं, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर अपराध हो जाते हैं और परिवार के बुजुर्ग भी इसमें घसीट लिए जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जो लोग समझा-बुझाकर सुलह करा सकते थे, वे खुद आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने के कारण असहाय हो जाते हैं।”

इसके अलावा, अदालत ने प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य (2010) के फैसले पर भरोसा किया, जो यह निर्देश देता है कि अदालतों को करीबी रिश्तेदारों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अत्यंत सावधानी और सतर्कता के साथ जांच करनी चाहिए।

अदालत का निर्णय

इन कानूनी मानकों को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने पाया कि आपराधिक मामला साल 2017 में तब शुरू किया गया था, जब पत्नी को साल 2015 में पति द्वारा दायर किए गए तलाक के मुकदमे का समन मिला था। इसके परिणामस्वरूप, अदालत ने माना कि यह मुकदमा पति की कानूनी कार्रवाई के सीधे जवाब में दर्ज कराया गया था।

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पुलिस द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला:

“वर्तमान मामले में केस डायरी में मौजूद सामग्री दर्शाती है कि आरोप सामान्य प्रकृति के हैं।”

“शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि भी नहीं हुई है।”

“ऐसे में, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ इस मामले को आगे बढ़ाने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग होगा, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कथित अपराधों को साबित करने के लिए आवश्यक तत्वों में से कोई भी मौजूद नहीं है।”

तदनुसार, हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया और सभी पांच याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लंबित कार्यवाही को रद्द कर दिया।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: कृष्णा लाल पॉल और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य
वाद संख्या: सीआरआर 5025 ऑफ 2024
पीठ: जस्टिस शम्पा दत्त (पॉल)
निर्णय की तिथि: 07.07.2026

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