करूर भगदड़ मामला: टीवीके नेताओं के बयानों पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची डीएमके

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर तमिलगा वेट्ट्री कड़गम (टीवीके) के नेताओं और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय पर करूर भगदड़ मामले में सार्वजनिक बयानबाजी और आरोप लगाने से रोकने की मांग की है। इस हादसे में 41 लोगों की जान चली गई थी।

डीएमके के संगठनात्मक सचिव आर. एस. भारती द्वारा शुक्रवार को दायर की गई इस याचिका में मांग की गई है कि सक्रिय जांच के बीच टीवीके नेताओं को इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा करने से रोका जाए, ताकि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की कार्रवाई निष्पक्ष रूप से चलती रहे।

यह कानूनी कदम तमिलनाडु में आए राजनीतिक बदलावों के बीच उठाया गया है। डीएमके की याचिका में इस बात को रेखांकित किया गया है कि 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद तमिलनाडु कैबिनेट में कई ऐसे लोगों को मंत्री बनाया गया है, जिनके नाम पुलिस की शुरुआती चार्जशीट में शामिल थे।

कैबिनेट मंत्रियों की बयानबाजी पर आपत्ति

डीएमके की इस याचिका में विशेष रूप से तमिलनाडु के मंत्री आधव अर्जुना के गुरुवार को दिए गए एक सार्वजनिक भाषण का हवाला दिया गया है। अर्जुना ने अपने भाषण में कथित तौर पर कहा था कि करूर त्रासदी का “हिसाब चुकता करना अभी बाकी है”। उन्होंने तत्कालीन डीएमके सरकार पर पुलिस कार्रवाई के जरिए लोगों की “जान लेने” का आरोप भी लगाया था।

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इसके जवाब में डीएमके ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह सीबीआई को अर्जुना के इस बयान पर शिकायत दर्ज कर कार्रवाई करने का निर्देश दे। पार्टी का तर्क है कि इस तरह के सार्वजनिक बयान गवाहों को प्रभावित करने और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की श्रेणी में आते हैं।

मुख्यमंत्री के करूर दौरे पर जताई चिंता

याचिका में मुख्यमंत्री विजय के आगामी 10 जुलाई को होने वाले करूर दौरे पर भी चिंता व्यक्त की गई है। इस दौरे के दौरान मुख्यमंत्री भगदड़ के पीड़ितों के परिवारों से मिलकर उन्हें सरकारी सहायता और अनुकंपा के आधार पर नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपने वाले हैं।

डीएमके का कहना है कि वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व और सरकार का सीधे गवाहों से मिलना और उन्हें इस हादसे से जुड़ी राहत सामग्री बांटना जांच को प्रभावित कर सकता है। याचिका के अनुसार, इससे जारी जांच की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर वास्तविक या काल्पनिक रूप से सवाल उठ सकते हैं।

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सीबीआई जांच की पृष्ठभूमि

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच को स्थानीय पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंप दिया था। अदालत का कहना था कि इस भीषण हादसे ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है, इसलिए इसकी पूरी तरह स्वतंत्र जांच होना जरूरी है। यह आदेश खुद टीवीके (अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी) की याचिका पर आया था।

जांच को पूरी तरह पारदर्शी रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश अजय रस्तोगी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एक निगरानी समिति का भी गठन किया था, जो सीबीआई की प्रगति की निगरानी कर रही है।

स्थानीय पुलिस की शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, जिस रैली में भगदड़ मची थी, वहां क्षमता से लगभग तीन गुना ज्यादा भीड़ जुट गई थी। 10,000 लोगों की अनुमति के मुकाबले वहां लगभग 27,000 लोग पहुंचे थे। उस समय पुलिस प्रशासन ने इस हादसे के लिए मुख्यमंत्री विजय के कार्यक्रम स्थल पर सात घंटे की देरी से पहुंचने को जिम्मेदार ठहराया था।

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