साइबर फ्रॉड की तुरंत शिकायत के बाद भी निष्क्रिय रहने पर बैंक पर जुर्माना, पीड़ित महिला को मिलेंगे 1.10 लाख रुपये

साइबर धोखाधड़ी की तत्काल सूचना मिलने के बाद भी कार्रवाई न करने पर तमिलनाडु के एक उपभोक्ता आयोग ने बैंक को सख्त फटकार लगाई है। तंजावुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महिला ग्राहक की शिकायत पर सुनवाई करते हुए बैंक को 1.10 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि ग्राहक द्वारा तुरंत सूचना दिए जाने के बावजूद बैंक का निष्क्रिय बने रहना ‘सेवा में कमी’ के दायरे में आता है।

मुआवजे और रिफंड का ब्योरा

आयोग के अध्यक्ष टी शेखर और सदस्य के वेलुमणि की पीठ ने 28 जुलाई को यह आदेश जारी किया। पीठ ने बैंक को पीड़िता के खाते से उड़ाए गए 50,000 रुपये लौटाने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, मानसिक प्रताड़ना, वित्तीय परेशानी और असुविधा के एवज में 50,000 रुपये का मुआवजा तथा 10,000 रुपये मुकदमे का खर्च देने के लिए कहा है।

फिशिंग अटैक का घटनाक्रम

यह मामला एक मैसेज से शुरू हुआ था, जिसमें पीड़ित महिला को 12,980 रुपये का इनाम देने का झांसा दिया गया था। मैसेज में दिए गए लिंक पर क्लिक करके जैसे ही महिला ने अपनी ऑनलाइन बैंकिंग जानकारी दर्ज की, उनके पास एक ओटीपी आया। इसके तुरंत बाद अनधिकृत तरीके से नया लाभार्थी (बेनिफिशियरी) जोड़कर उनके खाते से 50,000 रुपये निकाल लिए गए।

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पैसे कटने का पता चलते ही महिला ने बिना देरी किए बैंक के कस्टमर केयर पर संपर्क किया, ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई और साइबर क्राइम अधिकारियों को भी मामले की सूचना दी। इसके बाद उन्होंने पूर्ण रिफंड और 1 लाख रुपये के मुआवजे की मांग को लेकर उपभोक्ता आयोग का रुख किया।

बैंक की दलील और आयोग की टिप्पणी

बैंक ने अपनी सफाई में तर्क दिया कि यह लेन-देन ग्राहक की खुद की गलती से हुआ है, क्योंकि उन्होंने संदिग्ध लिंक पर अपना यूजरनेम, पासवर्ड और ओटीपी साझा किया था। बैंक का कहना था कि उसने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सभी सुरक्षा दिशानिर्देशों का पालन किया है और यह नुकसान ग्राहक की लापरवाही का नतीजा है।

हालांकि, आयोग ने बैंक के इन तर्कों को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि बैंक यह साबित करने के लिए कोई भी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका कि ग्राहक से शिकायत मिलने के बाद उसने क्या कदम उठाए। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11) का हवाला देते हुए आयोग ने स्पष्ट किया कि जब ग्राहक तुरंत साइबर धोखाधड़ी की रिपोर्ट करता है, तो बैंक अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता और न ही सारा दोष ग्राहक पर मढ़ सकता है। आयोग ने यह भी साफ किया कि बैंक साइबर अपराधों के लिए बीमाकर्ता नहीं हैं, लेकिन ग्राहक की समय पर दी गई सूचना पर त्वरित कार्रवाई करना बैंक का अनिवार्य दायित्व है।

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