जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने निर्णय दिया कि चुनाव चक्र के दौरान उम्मीदवारों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने के लिए संबंधित हाईकोर्ट की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। चुनावी प्रक्रिया में अघोषित नकदी और राजनीतिक प्रभाव के बढ़ते चलन पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तलाशी, जब्ती, जांच की समय-सीमा और अभियोजन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला साल 2014 में कर्नाटक की बेल्लारी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव से शुरू हुआ था। चुनाव आयोग द्वारा गठित उड़न दस्ते (फ्लाइंग स्क्वाड) ने एक अज्ञात संदेश के आधार पर प्रतिवादी प्रतीक पारसरामपुरिया के आवासीय और व्यावसायिक परिसरों पर छापेमारी की थी। संदेश में आरोप लगाया गया था कि मतदाताओं को रिश्वत देने के उद्देश्य से नकली भारतीय मुद्रा जमा की गई है। इस कार्रवाई के दौरान अधिकारियों ने 20,48,355 रुपये नकद, एक लैपटॉप, चेकबुक, खुले चेक और एक पेन ड्राइव जब्त की थी।
इसके बाद, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 171ई और 188 के तहत मामला दर्ज किया गया। प्रतिवादी ने इस एफआईआर को रद्द कराने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 12 फरवरी 2015 को हाईकोर्ट ने एफआईआर को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि शिकायत में इस बात का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था कि आरोपी किसे रिश्वत देना चाहता था या इसके लिए उसने क्या तरीका अपनाया था। कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई का दायरा और पक्षकारों की दलीलें
चुनाव से जुड़े अपराधों में बनी ढांचागत कमियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2017 को चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने पाया कि राज्य अभियोजन तंत्र पर पूर्ण निर्भरता के कारण चुनाव के दौरान दर्ज कई आपराधिक मुकदमों की ठीक से पैरवी नहीं हो पाती। 5 अप्रैल 2019 के आदेश के तहत सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस मामले में पक्षकार बनाया गया। बाद में अदालत की सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल और अधिवक्ता डॉ. स्वप्निल त्रिपाठी को न्याय मित्र (अमिक्स क्यूरी) नियुक्त किया गया।
चुनाव आयोग ने उड़न दस्तों और स्टेटिक निगरानी टीमों के संचालन से जुड़े मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के साथ-साथ जब्ती और दर्ज एफआईआर से संबंधित आंकड़े कोर्ट के समक्ष रखे। इन आंकड़ों के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में 1,44,030 एफआईआर, 2024 के लोकसभा चुनाव में 3,87,430 एफआईआर और 2019 से 2025 के बीच विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में 2,01,894 एफआईआर दर्ज की गई थीं।
चुनाव आयोग ने कोर्ट के सामने यह मुद्दा भी उठाया कि राज्यों में सत्ता बदलने पर सरकारें चुनाव से जुड़े मुकदमों को एकतरफा वापस ले लेती हैं। आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए अपने 10 अगस्त 2009 के पत्र को रेखांकित किया, जिसमें कहा गया था कि चुनावी अपराधों से जुड़े मामलों को वापस नहीं लिया जाना चाहिए और उन्हें तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाना चाहिए। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग ने भी 2009 में यह राय दी थी कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 321 के तहत मुकदमा वापस लेने का अधिकार न्याय प्रशासन के हित में होना चाहिए, न कि कार्यकारी अधिकारियों के निर्देश पर।
न्याय मित्र ने 16 देशों की चुनावी व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया, जिसमें इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों में मामलों की वापसी पर न्यायिक निगरानी के मॉडल को रेखांकित किया गया।
अदालत का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
जस्टिस संजय करोल द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र, कानून के शासन और निष्पक्ष चुनावों के बीच अटूट संबंध पर बल दिया। चुनाव में धनबल के इस्तेमाल पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यदि अभिव्यक्ति का यह एकमात्र अवसर ही दूषित हो जाता है, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लोकतंत्र का मूल स्वरूप—जो लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिए शासन है—उससे समझौता हो जाता है।”
अघोषित धन के खतरे को रेखांकित करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया:
“अवैध और अघोषित धन मुख्य जरियों में से एक है। इसी को ‘ब्लैक मनी’ कहा जाता है।”
उड़न दस्तों और निगरानी टीमों की प्रक्रियाओं का मूल्यांकन करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि अधिकारियों को नकदी या सामग्री की जब्ती के समय अपने संदेह का लिखित कारण दर्ज करना होगा, ताकि आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो।
चुनाव अपराधों की समयबद्ध जांच पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“किसी व्यक्ति पर जांच का तमगा अनिश्चित काल के लिए लटका कर नहीं रखा जा सकता। चुनाव से जुड़े मामलों में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां जनता को यह जानने का अधिकार है कि उनकी पसंद के उम्मीदवार ने कोई भ्रष्ट आचरण या प्रलोभन दिया है या नहीं, जो अवैध, अनैतिक और अस्वीकार्य माना जाएगा।”
चुनाव के बाद मुकदमे वापस लेने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए पीठ ने माना:
“एक बार उनके खिलाफ अभियोजन शुरू हो जाने के बाद, केवल सत्ता परिवर्तन होने से वे जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। दूसरे शब्दों में, एक संवैधानिक लोकतंत्र अपने प्रतिनिधियों से नैतिक शुद्धता और ईमानदारी के समान मानदंड की अपेक्षा करता है।”
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी प्रमुख निर्देश
चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:
- जब्ती की रिपोर्टिंग: नकद या अन्य संपत्ति जब्त करने पर संबंधित प्राधिकारी को 24 घंटे के भीतर जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट या सक्षम अदालत को लिखित कारणों के साथ रिपोर्ट सौंपनी होगी, जिससे अपराध और जब्ती के बीच प्रथम दृष्टया संबंध स्पष्ट हो सके।
- जांच की समय-सीमा: जांच अधिकारियों को चुनाव से जुड़ी एफआईआर की जांच दर्ज होने की तिथि से 1 वर्ष के भीतर पूरी करने का प्रयास करना होगा। यदि देरी होती है, तो कारण दर्ज कर चुनाव आयोग को सूचित करना होगा।
- प्रगति रिपोर्ट: जांच अधिकारी को संबंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसपी) या पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) के अनुमोदन के बाद नोडल अधिकारी के माध्यम से चुनाव आयोग को त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट भेजनी होगी।
- आयकर विभाग को सूचना: स्टेटिक निगरानी टीमों द्वारा जांच के दौरान 10 लाख रुपये से अधिक की नकदी मिलने पर इसकी सूचना तुरंत आयकर अधिकारियों को दी जाएगी।
- विशेष अदालतें: हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया गया है कि वे उम्मीदवारों, मौजूदा सांसदों और विधायकों से जुड़े मुकदमों की त्वरित सुनवाई और तेजी से निपटारे के लिए विशेष अदालतें नामित करें।
- मुकदमा वापसी के लिए हाईकोर्ट की अनुमति: चुनाव चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ दर्ज किसी भी आपराधिक मामले को वापस लेने के लिए संबंधित हाईकोर्ट की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होगी।
- मामलों का त्वरित निपटारा: विचारण अदालतों को 2024 के लोकसभा चुनाव और 2019-2025 के विधानसभा चुनावों से संबंधित लंबित मुकदमों का निपटारा जल्द से जल्द करने के निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और सभी राज्य सरकारों को 18 नवंबर 2026 या उससे पहले इन निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द स्टेट ऑफ कर्नाटक एवं अन्य बनाम प्रतीक पारसरामपुरिया
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर ______ ऑफ 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) नंबर 3549/2016 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 17 अगस्त 2026

