कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नागरिकों को जारी किए जाने वाले कम अवधि (शॉर्ट-वैलिडिटी) वाले पासपोर्ट की समय-सीमा पर फिर से विचार करने को कहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि महज एक साल के लिए पासपोर्ट जारी करने की मौजूदा नीति के कारण अदालतों में अनावश्यक मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ज्यादातर विदेशी देश वीजा जारी करने के लिए पासपोर्ट में कम से कम छह महीने की वैधता होना अनिवार्य करते हैं। ऐसे में केवल एक वर्ष के लिए जारी पासपोर्ट यात्रियों के लिए व्यावहारिक नहीं रहता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है और पासपोर्ट जारी न होने या प्रशासनिक देरी के कारण इसे बाधित नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी विवाद
यह टिप्पणी बेंगलुरु निवासी 53 वर्षीय अजीत रांका की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। रांका के खिलाफ उनकी पत्नी ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (दहेज उत्पीड़न), 341 (गलत तरीके से रोकना) और 354(B) (महिला पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग) के तहत मामला दर्ज कराया हुआ है।
रांका का पासपोर्ट 2023 में समाप्त हो गया था। उन्होंने इसके नवीनीकरण के लिए आवेदन किया, जिसे पासपोर्ट अधिकारियों ने 3 दिसंबर 2025 को खारिज कर दिया। इसके बाद रांका ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट के 16 दिसंबर 2025 के आदेश के बाद क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने 2 फरवरी 2026 को उनका पासपोर्ट एक वर्ष की अवधि के लिए नवीनीकृत कर दिया।
हाईकोर्ट का निर्देश और ट्रायल कोर्ट की शर्त
एक साल की अवधि पूरी होने पर जब रांका ने दोबारा नवीनीकरण का प्रयास किया, तो पासपोर्ट प्राधिकारी ने 27 जुलाई को एक नोटिस जारी किया। नोटिस में उनसे या तो आपराधिक केस खत्म होने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा गया या फिर संबंधित ट्रायल कोर्ट से यात्रा की औपचारिक अनुमति लाने को कहा गया। रांका ने इस नोटिस को रद्द करने और तुरंत नया पासपोर्ट जारी करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिका का आंशिक निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने रांका को 27 जुलाई के नोटिस का जवाब देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि वह अधिकारियों के समक्ष एक औपचारिक अंडरटेकिंग जमा करें, जिसमें यह वचन दिया जाए कि वह मामले की सुनवाई कर रही संबंधित ट्रायल कोर्ट से पूर्व अनुमति मिलने के बाद ही विदेश यात्रा करेंगे।
संविधान और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला
सुनवाई के दौरान रांका के अधिवक्ता धीरज ए.के. ने दलील दी कि पासपोर्ट धारक होना और विदेश यात्रा करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
रांका के पक्ष में वकील ने 1978 के ऐतिहासिक ‘मेनका गांधी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ दिया, जिसमें विदेश यात्रा के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के 2025 के ‘महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ’ फैसले का भी उल्लेख किया गया, जिसके अनुसार कानून के दायरे में रहते हुए आवाजाही, यात्रा और आजीविका की तलाश नागरिक का महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है।

