यूपी गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 अन्य आपराधिक मुकदमों पर रोक नहीं लगाती, प्राथमिकता केवल तारीखों के टकराव की स्थिति में लागू होती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 की धारा 12 का उद्देश्य किसी आरोपी के खिलाफ चल रहे अन्य आपराधिक मुकदमों को रोकना या स्थगित करना नहीं है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत गैंगस्टर्स एक्ट के तहत विचारण लंबित होने के आधार पर हत्या के मुकदमे की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 12 केवल यह अनिवार्य करती है कि यदि सुनवाइयों की तारीखों में कोई सीधा टकराव होता है, तो गैंगस्टर्स एक्ट के मुकदमे को प्राथमिकता दी जाएगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के तालबेहाट थाने में 30 सितंबर 2023 को दर्ज एक प्राथमिकी से शुरू हुआ था। मृतक राघवेंद्र सिंह के भाई केशवेंद्र सिंह द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि शंकर सिंह (प्रतिवादी संख्या 1) सहित नौ आरोपियों ने राघवेंद्र सिंह की लाठियों, पत्थरों और लोहे की छड़ों से बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। जांच के बाद, सात आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147, 323, 504, 506, 302 और 427 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया। मामले का संज्ञान लेते हुए इसे अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, ललितपुर की अदालत में सुपुर्द किया गया, जिसे सत्र परीक्षण संख्या 0934/2023 के रूप में दर्ज किया गया।

नवंबर 2023 में, थाना प्रभारी (एसएचओ) ने एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया कि यह अपराध एक गठित गिरोह के हिस्से के रूप में किया गया था। इसके आधार पर गैंग चार्ट तैयार किया गया और 1 जनवरी 2024 को उन्हीं आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 2(b)(i) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। 20 फरवरी 2024 को, हाईकोर्ट ने एक आरोपी की जमानत याचिका का निपटारा करते हुए आईपीसी के तहत दर्ज हत्या के मुकदमे को एक वर्ष के भीतर पूरा करने के लिए दैनिक सुनवाई का निर्देश दिया।

हालाँकि, 18 जनवरी 2025 को—जब हत्या के मुकदमे में अभियोजन पक्ष के साक्ष्य समाप्त हो चुके थे और मामला दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत बयान दर्ज करने के लिए तय था—आरोपियों ने गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 का हवाला देते हुए आईपीसी के मुकदमे को स्थगित रखने के लिए आवेदन दायर किया।

विचारण अदालत ने 3 मार्च 2025 को यह आवेदन खारिज कर दिया और टिप्पणी की कि गैंगस्टर्स एक्ट का मुकदमा अभी शुरू भी नहीं हुआ था, तथा धारा 12 का उपयोग किसी ऐसे मुकदमे को रोकने के लिए नहीं किया जा सकता जो समापन के करीब है। इसके बाद पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 25 अगस्त 2025 को विचारण अदालत के आदेश को उलट दिया और निर्देश दिया कि हत्या के मुकदमे को स्थगित रखा जाए तथा गैंगस्टर्स एक्ट के मुकदमे में तेजी लाई जाए। इस आदेश के खिलाफ शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

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पक्षों के तर्क

  • अपीलकर्ता (शिकायतकर्ता): वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 की गलत व्याख्या की है। यह प्रावधान केवल तारीखों के टकराव की स्थिति में प्राथमिकता सुनिश्चित करता है ताकि मुकदमों में देरी न हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अंतिम चरण में पहुंच चुके हत्या के मुकदमे को उस गैंगस्टर्स एक्ट के मुकदमे के लिए रोक दिया जाए जो अभी शुरुआती चरण में है।
  • प्रतिवादी संख्या 1 (आरोपी): बचाव पक्ष के वकील ने हाईकोर्ट के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि धारा 12 अन्य अदालतों में आरोपी के खिलाफ चल रहे किसी भी अन्य मामले की तुलना में गैंगस्टर्स एक्ट के तहत मुकदमों को प्राथमिकता देती है।
  • उत्तर प्रदेश राज्य: राज्य सरकार ने प्रस्तुत किया कि एक नृशंस हत्या के मुकदमे को धारा 12 के कठोर अनुप्रयोग के कारण अनिश्चितता में नहीं डाला जाना चाहिए। राज्य ने कानून के कठोर नियमों को उदार बनाने के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए गंभीर हत्या की कार्यवाहियों को रुकने से बचाने का आग्रह किया।

कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 346 [पूर्ववर्ती सीआरपीसी की धारा 309] और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 के दायरे का गहन विश्लेषण किया।

1. गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 का दायरा

अदालत ने दोहराया कि धारा 12 का उद्देश्य तारीखों के टकराव के बिना त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करना है, न कि अन्य कार्यवाहियों पर रोक लगाना। धर्मेंद्र कीरथल बनाम यूपी राज्य एवं अन्य (2013) के मिसाल का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

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“यह प्रावधान स्पष्ट रूप से आदेश देता है कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विशेष अदालत द्वारा इस अधिनियम के तहत किसी भी अपराध के मुकदमे को प्राथमिकता दी जाएगी और अन्य अदालतों में विचारण की तुलना में इसे पहले पूरा किया जाएगा। विधायिका ने यह उचित समझा कि ऐसे अन्य मामले का विचारण स्थगित रहे। यहाँ यह ध्यान देना योग्य है कि ‘किसी अन्य अदालत’ में आरोपी के खिलाफ ‘किसी अन्य मामले’ में विशेष अदालत शामिल नहीं है। जोर त्वरित सुनवाई पर है, विचारण के इनकार पर नहीं। विधायिका ने ऐसा प्रावधान इसलिए शामिल किया है ताकि किसी आरोपी को एक साथ दो मामलों में मुकदमे का सामना न करना पड़े और तारीखों के टकराव के कारण विशेष अदालत का मामला अटका न रहे।”

पीठ ने मोबिन इफ्तिखार जैदी बनाम यूपी राज्य (2011) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था:

“इसकी मंशा यह थी कि अन्य मुकदमों और गैंगस्टर्स एक्ट के तहत मामले में तय तारीखें आपस में न टकराएं, ताकि गैंगस्टर्स एक्ट का मुकदमा बिना किसी अनावश्यक देरी या बाधा के जल्द से जल्द अपने तार्किक अंजाम तक पहुंचे। विधायिका की मंशा यह कदापि नहीं हो सकती कि यदि कोई व्यक्ति हत्या, डकैती, लूट और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में वांछित है, तो गैंगस्टर्स एक्ट के मुकदमे के समापन तक उन अपराधों का विचारण आगे न बढ़े।”

2. बीएनएसएस की धारा 346 के तहत प्रतिदिन सुनवाई का दायित्व

गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 को बीएनएसएस की धारा 346 (सीआरपीसी की धारा 309) के साथ पढ़ते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आपराधिक कार्यवाहियां दैनिक आधार पर जारी रहनी चाहिए। धारा 12 केवल तभी प्रभावी होती है जब सुनवाई की तारीखों में कोई सीधा टकराव पैदा होता है।

3. अनुच्छेद 21 के तहत पीड़ित का त्वरित सुनवाई का अधिकार

अदालत ने इस बात पर विशेष बल दिया कि अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार केवल आरोपी के लिए ही नहीं है, बल्कि यह पीड़ित और समाज के लिए भी उतना ही मूल्यवान अधिकार है। रत्तीराम एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2012) और मंगल सिंह बनाम किशन सिंह (2009) का उल्लेख करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार पर इस अदालत द्वारा बार-बार जोर दिया गया है। इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक अंतर्निहित पहलू के रूप में मान्यता दी गई है। त्वरित सुनवाई का पूरा उद्देश्य उत्पीड़न से बचना और देरी को रोकना है। न्याय प्रणाली से जुड़े सभी लोगों का यह पवित्र दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि आपराधिक न्याय का प्रशासन प्रभावी, जीवंत और सार्थक बने।”

रत्तीराम मामले से आगे उद्धृत करते हुए अदालत ने कहा:

“किसी आपराधिक मुकदमे के समापन में अत्यधिक देरी का समाज पर सामान्य रूप से और विशेष रूप से मामले के दोनों पक्षों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन यह मान लेना एक भारी भूल होगी कि मुकदमे में देरी से पीड़ित को कोई पीड़ा या कष्ट नहीं होता। कई मामलों में पीड़ित को आरोपी से भी अधिक पीड़ा सहन करनी पड़ती है। इसलिए, मुकदमे में देरी के सभी लाभ केवल आरोपी को देने और अपराध के पीड़ित को पूरी तरह से न्याय से वंचित करने का कोई औचित्य नहीं है।”

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि आरोपी द्वारा प्रस्तावित व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाता है, तो धारा 12 अनुच्छेद 21 के तहत असंवैधानिक हो जाएगी, जिससे आरोपियों को मुकदमों में देरी करने का एक जरिया मिल जाएगा, जबकि समय बीतने के साथ साक्ष्य नष्ट हो जाएंगे और गवाहों की याददाश्त धुंधली पड़ जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त 2025 के हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने नोट किया कि 13 अप्रैल 2026 के उसके अंतरिम आदेश के अनुपालन में, विचारण अदालत ने सत्र परीक्षण संख्या 934/2023 को पहले ही समाप्त कर दिया है और सभी आरोपियों को धारा 302 आईपीसी व अन्य धाराओं के तहत दोषी ठहराया जा चुका है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: केशवेंद्र सिंह बनाम शंकर सिंह और अन्य

वाद संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर ऑफ 2026 (@ स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 2815/2026)

पीठ: जस्टिस के. वी. विश्वनाथन, जस्टिस अरुण पल्ली

निर्णय की तिथि: 17 अगस्त 2026

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