दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के एक ड्राइवर की बर्खास्तगी के फैसले को सही ठहराया है, जिसे करीब 40 साल पहले बिना बताए छुट्टी पर रहने के कारण नौकरी से निकाल दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई विभागीय जांच (डार्टमेंटल इंक्वायरी) केवल एक दिन में पूरी हो जाती है, तो सिर्फ इस आधार पर कार्रवाई को गलत या अनुचित नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने ड्राइवर के कानूनी वारिसों की अपील को खारिज कर दिया। ड्राइवर की मृत्यु के बाद उसके परिवार ने इस कानूनी लड़ाई को जारी रखा था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिना अनुमति के काम से गायब रहने को केवल सहानुभूति के आधार पर माफ नहीं किया जा सकता और बीमारी के दावों को साबित करने के लिए पुख्ता सबूत पेश करना जरूरी है।
चार दशक पुराना कानूनी विवाद
यह मामला साल 1982 में शुरू हुआ था, जब उक्त कर्मचारी को डीटीसी में ड्राइवर के पद पर नियुक्त किया गया था। अगस्त 1987 में, निगम ने उन्हें 1 जनवरी से 31 जुलाई 1987 के बीच बिना वेतन 161 दिनों तक अनुपस्थित रहने के आरोप में चार्जशीट जारी की थी। कर्मचारी द्वारा इन आरोपों से इनकार किए जाने के बाद विभागीय जांच शुरू की गई और 2 फरवरी 1988 को उन्हें सेवा से हटा दिया गया।
इसके बाद ड्राइवर ने अपनी बर्खास्तगी को लेबर कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि वह अपनी और अपनी पत्नी की बीमारी के कारण ड्यूटी पर नहीं आ सके थे और इसके लिए उन्होंने डिपो अधिकारियों को छुट्टी के आवेदन भी भेजे थे, जिन्होंने उनकी बिना वेतन की छुट्टी मंजूर की थी। साल 2009 में लेबर कोर्ट ने ड्राइवर के पक्ष में फैसला सुनाया। लेबर कोर्ट का मानना था कि केवल एक दिन में जांच पूरी करना जल्दबाजी को दर्शाता है, इसलिए उसने ड्राइवर को दोबारा सेवा में बहाल करने का आदेश दिया।
सिंगल जज का फैसला और कानूनी लड़ाई
डीटीसी ने लेबर कोर्ट के इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट के सिंगल जज के समक्ष चुनौती दी। अप्रैल 2010 में, सिंगल जज ने लेबर कोर्ट के फैसले को पलट दिया। सिंगल जज ने टिप्पणी की थी कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में अनुशासनहीनता या अकर्मण्यता को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस फैसले के खिलाफ अपील प्रक्रिया के दौरान ही ड्राइवर की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके कानूनी वारिसों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
अपील के दौरान वारिसों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अरुण भारद्वाज ने तर्क दिया कि सिंगल जज का यह निष्कर्ष गलत था कि ड्राइवर को बचाव का पूरा मौका मिला। उन्होंने कहा कि एक ही दिन में जांच पूरी करने से कर्मचारी के अधिकारों का हनन हुआ और वे अपने छुट्टी के दस्तावेज पेश नहीं कर पाए। वकील ने यह भी कहा कि ड्राइवर होने के नाते उनसे जटिल कानूनी प्रक्रियाओं को समझने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी।
दूसरी ओर, डीटीसी की पैरवी कर रही वकील अवनिष अहलावत ने दलील दी कि ड्राइवर को अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा मौका दिया गया था, लेकिन वे 161 दिनों की अनुपस्थिति को सही साबित करने वाला कोई भी मेडिकल सर्टिफिकेट या आवेदन पत्र पेश नहीं कर सके। उन्होंने लेबर कोर्ट के फैसले को रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के विपरीत बताया।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने डीटीसी के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड के अनुसार, ड्राइवर को जांच के दौरान अपना सहायक (डिफेंस असिस्टेंट) नियुक्त करने का विकल्प दिया गया था, जिसे उन्होंने खुद ही ठुकरा दिया था। इसके अलावा, अदालत ने यह भी नोट किया कि ड्राइवर पहले भी दो बार बिना अनुमति अत्यधिक छुट्टियां लेने के लिए दंडित हो चुके थे और वे लगातार अनुपस्थित रहने के आदी थे। अदालत ने माना कि इस मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है और सिंगल जज के 2010 के आदेश को बरकरार रखा।

